ब्रह्मांड नोट्स ( UNIVERSE Notes)

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खगोल विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है, जिसमें खगोलीय पिंडों जैसे तारे, ग्रह, उपग्रह, आकाशगंगाएँ तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड का अध्ययन किया जाता है। इसमें इनके उद्गम, संरचना, गति एवं विकास का अध्ययन शामिल है।

खगोलशास्त्री

खगोलशास्त्री वे वैज्ञानिक होते हैं जो दूरबीनों एवं वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से खगोलीय पिंडों का अध्ययन करते हैं।


ब्रह्मांड अथवा कॉसमॉस वह असीम विस्तार है जिसमें समस्त द्रव्य, ऊर्जा, तारे, ग्रह, आकाशगंगाएँ, विकिरण तथा समय सम्मिलित हैं। ब्रह्मांड अत्यन्त विशाल है और निरन्तर विस्तारशील है।


(क) भूकेन्द्रिक सिद्धांत

  • इस सिद्धांत का प्रतिपादन टॉलेमी ने किया।
  • पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया।
  • वर्तमान में यह सिद्धांत अस्वीकार कर दिया गया है।

(ख) सूर्यकेन्द्रिक सिद्धांत

  • इस सिद्धांत का प्रतिपादन कोपरनिकस ने किया।
  • सूर्य को केंद्र में तथा ग्रहों को सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करते हुए बताया गया।
  • आधुनिक खगोल विज्ञान का आधार।

(ग) हर्शेल का सिद्धांत

  • विलियम हर्शेल द्वारा प्रतिपादित।
  • ब्रह्मांड को चपटे चक्र (डिस्क) के आकार का माना।
  • सूर्य को इसके निकटवर्ती केंद्र में स्थित बताया।

(घ) हबल का सिद्धांत

  • एडविन हबल द्वारा प्रतिपादित।
  • आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से दूर जा रही हैं।
  • ब्रह्मांड के विस्तारशील होने का प्रमाण।

(क) महाविस्फोट सिद्धांत (Big Bang Theory)

  • ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक अत्यन्त गर्म एवं सघन अवस्था से हुई।
  • लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व एक महाविस्फोट हुआ।
  • इसके पश्चात ब्रह्मांड का निरन्तर विस्तार हो रहा है।
  • सर्वाधिक स्वीकृत सिद्धांत।

(ख) लाल विस्थापन सिद्धांत (Red Shift Theory)

  • दूरस्थ आकाशगंगाओं से आने वाला प्रकाश लाल रंग की ओर खिसकता है।
  • यह ब्रह्मांड के विस्तार का संकेत है।

(ग) स्थिर अवस्था सिद्धांत (Steady State Theory)

  • ब्रह्मांड न आदि है, न अंत।
  • नया द्रव्य निरन्तर उत्पन्न होता रहता है।
  • वर्तमान में अस्वीकार्य।

(घ) स्पंदनशील / दोलनशील ब्रह्मांड सिद्धांत

  • ब्रह्मांड विस्तार एवं संकुचन के चक्रों से गुजरता है।
  • पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में अस्वीकृत।

ब्रह्मांड की आयु

ब्रह्मांड की अनुमानित आयु लगभग 13.8 अरब वर्ष मानी जाती है।


अंतरिक्ष में पाए जाने वाले प्राकृतिक पिंडों को खगोलीय पिंड कहा जाता है, जैसे— तारे, ग्रह, उपग्रह, क्षुद्रग्रह, धूमकेतु आदि।


(क) परंपरागत ग्रह

ग्रह वे खगोलीय पिंड हैं जो सूर्य के चारों ओर निश्चित दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं।

सूर्य से दूरी के अनुसार ग्रहों का क्रम
बुध → शुक्र → पृथ्वी → मंगल → बृहस्पति → शनि → अरुण → वरुण

आकार के आधार पर

  • सबसे बड़ा ग्रह: बृहस्पति
  • सबसे छोटा ग्रह: बुध

(ख) बौने ग्रह

वे पिंड जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं, परंतु अपनी कक्षा को पूर्णतः साफ नहीं कर पाए हैं।
उदाहरण: प्लूटो, सेरेस, एरिस।

(ग) लघु सौरमंडलीय पिंड

क्षुद्रग्रह, धूमकेतु एवं उल्कापिंड।


आकाशगंगा तारों, गैस एवं धूल का विशाल समूह है जो गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा बंधा होता है।
हमारी आकाशगंगा को दुग्धमेखला (Milky Way) कहा जाता है।

रेडियो आकाशगंगा

वे आकाशगंगाएँ जो तीव्र रेडियो तरंगों का उत्सर्जन करती हैं।


तारे स्वयं प्रकाश उत्पन्न करने वाले अत्यधिक गर्म गैसीय पिंड होते हैं, जिनमें मुख्यतः हाइड्रोजन एवं हीलियम गैस पाई जाती है।

तारों का जीवन चक्र

नीहारिका → आदितारा → मुख्य अनुक्रम तारा → लाल दानव → अंतिम अवस्था

श्वेत बौना तारा

कम द्रव्यमान वाले तारों का अंतिम सघन अवशेष।

सुपरनोवा

विशाल तारे के अंत में होने वाला तीव्र विस्फोट।

न्यूट्रॉन तारे

अत्यधिक सघन तारे, जो मुख्यतः न्यूट्रॉनों से बने होते हैं।

कृष्ण विवर (Black Hole)

अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण वाला क्षेत्र, जहाँ से प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता।

चंद्रशेखर सीमा

श्वेत बौने तारे का अधिकतम द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का 1.4 गुना होता है, जिसे चंद्रशेखर सीमा कहते हैं।


तारों के ऐसे समूह जो आकाश में किसी निश्चित आकृति का निर्माण करते हैं, तारामंडल कहलाते हैं।
उदाहरण: ओरायन, सप्तर्षि मंडल।


सूर्य तथा उसके चारों ओर परिक्रमा करने वाले समस्त खगोलीय पिंडों के समूह को सौरमंडल कहते हैं।

सूर्य

  • सौरमंडल का केंद्र।
  • ऊष्मा एवं प्रकाश का मुख्य स्रोत।

ग्रह

सूर्य के चारों ओर निश्चित कक्षाओं में परिक्रमा करने वाले पिंड।

आंतरिक (स्थलीय) ग्रह

बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल

  • चट्टानी प्रकृति
  • आकार में छोटे

बाह्य (गैसीय / बृहस्पतिय) ग्रह

बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण

  • आकार में बड़े
  • गैसीय प्रकृति

सौरमंडल की सीमाएँ

सौरमंडल की बाहरी सीमा काइपर बेल्ट तथा ऊर्ट मेघ तक मानी जाती है।


क्षुद्रग्रह

मंगल एवं बृहस्पति के बीच स्थित चट्टानी पिंड।

धूमकेतु

बर्फीले पिंड जिनकी कक्षा अत्यधिक दीर्घवृत्ताकार होती है।

उल्कापिंड / उल्कापात

वे उल्काएँ जो पृथ्वी के वायुमंडल को पार कर पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं।


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