कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध -1540 ई.

कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध (1540 ई.)

कन्नौज का युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह युद्ध शेरशाह सूरी और मुगल सम्राट हुमायूँ के बीच 1540 ई. में लड़ा गया था। इस युद्ध में हुमायूँ की पराजय हुई और भारत में मुगल सत्ता को बड़ा झटका लगा। इसके परिणामस्वरूप भारत में सूर साम्राज्य की स्थापना हुई और हुमायूँ को भारत छोड़कर निर्वासन में जाना पड़ा।

यह युद्ध UPSC, SSC, State PCS तथा अन्य सरकारी नौकरी परीक्षाओं के मध्यकालीन इतिहास खंड के लिए महत्वपूर्ण है।

मूल अवधारणा एवं महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
युद्ध का नामकन्नौज का युद्ध (Battle of Kannauj)
दूसरा प्रचलित नामबिलग्राम का युद्ध (Battle of Bilgram)
युद्ध का वर्ष1540 ई.
प्रमुख पक्षहुमायूँ और शेरशाह सूरी
हुमायूँ का वंशमुगल वंश
शेरशाह का वंशसूर वंश
हुमायूँ की स्थितिमुगल सम्राट
शेरशाह की स्थितिअफगान नेता
परिणामहुमायूँ की पराजय, शेरशाह की विजय
प्रमुख परिणामभारत में मुगल सत्ता का अस्थायी अंत और सूर शासन की स्थापना

ध्यान दें: कन्नौज और बिलग्राम इस युद्ध के दो प्रचलित नाम हैं। परीक्षा में इन्हें दो अलग-अलग युद्ध न समझें।

युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1. हुमायूँ और शेरशाह के बीच संघर्ष

बाबर की मृत्यु के बाद 1530 ई. में हुमायूँ मुगल सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल में अफगान शक्ति का पुनरुत्थान हुआ, जिसका नेतृत्व शेरशाह सूरी कर रहा था।

शेरशाह ने बिहार और बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत की तथा मुगल सत्ता को चुनौती दी।

2. चौसा का युद्ध (1539 ई.)

कन्नौज के युद्ध से पहले हुमायूँ और शेरशाह के बीच चौसा का युद्ध (1539 ई.) हुआ था।

  • युद्ध में शेरशाह सूरी की विजय हुई।
  • हुमायूँ को पीछे हटना पड़ा।
  • शेरशाह की राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठा बढ़ी।
  • संघर्ष का निर्णायक चरण अगले वर्ष कन्नौज में सामने आया।

कन्नौज के युद्ध के प्रमुख कारण

  1. हुमायूँ के भाइयों में मतभेद: कामरान, हिंदाल और अन्य मुगल राजकुमारों के साथ एकजुटता का अभाव था।
  2. शेरशाह की बढ़ती शक्ति: बिहार और बंगाल में अफगान शक्ति मजबूत हो चुकी थी।
  3. चौसा में पराजय: 1539 ई. की हार से मुगल सेना की स्थिति कमजोर हुई।
  4. सैन्य नेतृत्व की कमजोरी: मुगल सेना में समन्वय और प्रभावी नेतृत्व की कमी थी।
  5. रणनीतिक परिस्थितियाँ: गंगा नदी, वर्षा और दलदली शिविर जैसी परिस्थितियों ने मुगल सेना की कठिनाइयाँ बढ़ाईं। Outlines of Indian history+1

युद्ध का घटनाक्रम

  • चौसा की विजय के बाद शेरशाह ने अपनी शक्ति और मजबूत की।
  • हुमायूँ ने शेरशाह को रोकने के लिए सेना संगठित की।
  • दोनों सेनाएँ कन्नौज के निकट आमने-सामने आईं।
  • 17 मई 1540 ई. को निर्णायक युद्ध हुआ।
  • शेरशाह ने मुगल सेना को पराजित कर दिया।
  • हुमायूँ को पीछे हटना पड़ा और अंततः भारत से बाहर निर्वासन में जाना पड़ा।

युद्ध के परिणाम एवं ऐतिहासिक महत्व

परिणाममहत्व
हुमायूँ की पराजयउत्तर भारत में उसकी सत्ता समाप्त हो गई।
शेरशाह की विजयसूर वंश का शासन स्थापित हुआ।
दिल्ली और आगरा पर अधिकारशेरशाह ने उत्तर भारत में अपनी स्थिति मजबूत की।
हुमायूँ का निर्वासनउसे कई वर्षों तक भारत से बाहर रहना पड़ा।
मुगल सत्ता का अस्थायी अंतबाबर द्वारा स्थापित साम्राज्य पर सूर शासन का प्रभुत्व हो गया।

महत्वपूर्ण तथ्य: शेरशाह सूरी ने 1540 से 1545 ई. तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद सूर वंश कमजोर हुआ और हुमायूँ ने 1555 ई. में दिल्ली पर पुनः अधिकार करके मुगल सत्ता बहाल की।

महत्वपूर्ण कालक्रम (Chronology)

वर्षघटना
1526 ई.प्रथम पानीपत का युद्ध; बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया।
1530 ई.बाबर की मृत्यु; हुमायूँ मुगल सम्राट बना।
1539 ई.चौसा का युद्ध; शेरशाह ने हुमायूँ को हराया।
1540 ई.कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध; हुमायूँ की पुनः पराजय।
1540–1545 ई.शेरशाह सूरी का शासनकाल।
1545 ई.कालिंजर अभियान के दौरान शेरशाह की मृत्यु।
1555 ई.हुमायूँ ने दिल्ली पर पुनः अधिकार किया।
1556 ई.हुमायूँ की मृत्यु; अकबर मुगल सम्राट बना।

कन्नौज और चौसा के युद्ध में अंतर

आधारचौसा का युद्धकन्नौज का युद्ध
वर्ष1539 ई.1540 ई.
प्रमुख पक्षहुमायूँ और शेरशाहहुमायूँ और शेरशाह
परिणामशेरशाह की विजयशेरशाह की विजय
ऐतिहासिक प्रभावशेरशाह की शक्ति में वृद्धिहुमायूँ की सत्ता का अंत और सूर शासन की स्थापना

UPSC/SSC/PCS के लिए विशेष तथ्य

  • कन्नौज का युद्ध = बिलग्राम का युद्ध = 1540 ई.
  • यह युद्ध हुमायूँ और शेरशाह सूरी के बीच लड़ा गया था।
  • शेरशाह का मूल नाम फ़रीद ख़ान था।
  • चौसा की विजय के बाद फ़रीद ख़ान ने शेरशाह की उपाधि धारण की।
  • कन्नौज की विजय ने शेरशाह को उत्तर भारत का प्रमुख शासक बना दिया।
  • शेरशाह के शासनकाल में प्रशासन, भूमि-राजस्व व्यवस्था और सड़क निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य हुए।
  • हुमायूँ ने 1555 ई. में दिल्ली पुनः प्राप्त की; इसलिए 1540 ई. को मुगल सत्ता का स्थायी अंत नहीं समझना चाहिए। Outlines of Indian history+2

अक्सर भ्रमित करने वाले तथ्य

भ्रमसही तथ्य
चौसा और कन्नौज एक ही युद्ध थे।दोनों अलग-अलग युद्ध थे।
कन्नौज का युद्ध 1539 ई. में हुआ।यह युद्ध 1540 ई. में हुआ था।
हुमायूँ को केवल एक बार शेरशाह ने हराया।शेरशाह ने उसे चौसा और कन्नौज, दोनों युद्धों में हराया।
1540 ई. के बाद मुगल वंश हमेशा के लिए समाप्त हो गया।हुमायूँ ने 1555 ई. में मुगल शासन पुनः स्थापित किया।
शेरशाह मुगल वंश का शासक था।वह अफगान मूल के सूर वंश का शासक था।

Exam Facts / One-Liners

  • कन्नौज का युद्ध किस वर्ष हुआ? — 1540 ई.
  • कन्नौज के युद्ध में किसकी विजय हुई? — शेरशाह सूरी।
  • कन्नौज के युद्ध में किसकी पराजय हुई? — हुमायूँ।
  • कन्नौज के युद्ध का दूसरा नाम क्या है? — बिलग्राम का युद्ध।
  • कन्नौज के युद्ध से पहले कौन-सा युद्ध हुआ था? — चौसा का युद्ध (1539 ई.)।
  • सूर वंश का संस्थापक कौन था? — शेरशाह सूरी।
  • हुमायूँ ने दिल्ली पर पुनः कब अधिकार किया? — 1555 ई.।

Quick Revision

1540

ईस्वी

कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध

17 मई 1540 ई. — शेरशाह सूरी बनाम हुमायूँ

  • विजेता — शेरशाह सूरी
  • पराजित — हुमायूँ
  • पिछला प्रमुख युद्ध — चौसा (1539 ई.)
  • परिणाम — सूर शासन की स्थापना
  • हुमायूँ की वापसी — 1555 ई.
  • याद रखें — 1539 = चौसा, 1540 = कन्नौज, 1555 = हुमायूँ की वापसी।

Share To Care

Response

Leave a Reply

Discover more from बच्चनटॉप

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading