सुभाष चन्द्र बोस (नेताजी) सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स | जीवन परिचय, शिक्षा, आई.सी.एस., कांग्रेस में भूमिका एवं स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश (UPSC, SSC, PSC Complete Notes)

प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु उपयोगी: UPSC, State PSC, SSC CGL, CHSL, CPO, Railway, Banking, NDA, CDS, CAPF, CUET, UGC NET, B.Ed., CTET एवं अन्य सभी सामान्य अध्ययन परीक्षाएँ।


सुभाष चन्द्र बोस का परिचय

सुभाष चन्द्र बोस (Netaji Subhas Chandra Bose) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली, साहसी और दूरदर्शी नेताओं में से एक थे। वे उन विरले नेताओं में थे जिन्होंने यह विश्वास किया कि यदि आवश्यक हो तो सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से भी भारत को स्वतंत्र कराया जा सकता है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया और बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज (Indian National Army – INA) का नेतृत्व किया तथा आज़ाद हिन्द सरकार (Provisional Government of Free India) की स्थापना की।

भारतीय इतिहास में उन्हें केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्रवादी के रूप में याद किया जाता है जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनका प्रसिद्ध नारा—

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”

आज भी युवाओं में देशभक्ति और त्याग की भावना का संचार करता है।


परीक्षा की दृष्टि से महत्व

सुभाष चन्द्र बोस आधुनिक भारत के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं। UPSC, SSC, State PSC, Railway तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में उनके जीवन, कांग्रेस में भूमिका, आज़ाद हिन्द फ़ौज, फॉरवर्ड ब्लॉक, द्वितीय विश्व युद्ध, आज़ाद हिन्द सरकार तथा मृत्यु विवाद से नियमित प्रश्न पूछे जाते हैं।

विशेष रूप से निम्न विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं—

  • जन्म एवं परिवार
  • शिक्षा
  • ICS परीक्षा एवं त्यागपत्र
  • चित्तरंजन दास से संबंध
  • कांग्रेस अध्यक्ष (हरिपुरा एवं त्रिपुरी)
  • गांधी और बोस के मतभेद
  • फॉरवर्ड ब्लॉक
  • महान पलायन (Great Escape)
  • जर्मनी एवं जापान यात्रा
  • आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA)
  • आज़ाद हिन्द सरकार
  • इम्फाल एवं कोहिमा अभियान
  • INA Trials (लाल किला मुकदमा)
  • मृत्यु विवाद एवं आयोग

त्वरित तथ्य (Quick Facts)

विषयजानकारी
पूरा नामसुभाष चन्द्र बोस
प्रसिद्ध नामनेताजी
जन्म23 जनवरी 1897
जन्म स्थानकटक, उड़ीसा (वर्तमान ओडिशा)
पिताजानकीनाथ बोस
माताप्रभावती देवी
धर्महिन्दू
शिक्षाकटक, कलकत्ता एवं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
आई.सी.एस. परीक्षा1920 (चौथा स्थान)
त्यागपत्र1921
कांग्रेस अध्यक्ष1938 (हरिपुरा), 1939 (त्रिपुरी)
फॉरवर्ड ब्लॉक3 मई 1939
भारत से गुप्त प्रस्थानजनवरी 1941
आज़ाद हिन्द सरकार21 अक्टूबर 1943
INA का नेतृत्व1943
प्रसिद्ध नारा“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”
आधिकारिक मृत्यु18 अगस्त 1945 (ताइहोकू विमान दुर्घटना)

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म एवं परिवार

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक नगर में हुआ। उस समय उड़ीसा बंगाल प्रेसीडेंसी का भाग था। उनका परिवार सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित तथा आर्थिक रूप से सम्पन्न था।

उनके पिता जानकीनाथ बोस कटक के प्रसिद्ध वकील थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें “रायबहादुर” की उपाधि भी प्रदान की थी, जिसे बाद में उन्होंने राष्ट्रीय भावना के कारण त्याग दिया। उनकी माता प्रभावती देवी अत्यंत धार्मिक, सरल एवं संस्कारी महिला थीं। परिवार में धार्मिक वातावरण होने के कारण सुभाष के व्यक्तित्व में नैतिकता, अनुशासन तथा आध्यात्मिकता का विकास प्रारम्भ से ही हुआ।

सुभाष अपने माता-पिता की 14 संतानों में नौवें स्थान पर थे। बड़े संयुक्त परिवार में रहते हुए उन्होंने अनुशासन, सहयोग और जिम्मेदारी का महत्व सीखा।


पारिवारिक वातावरण का प्रभाव

सुभाष चन्द्र बोस के व्यक्तित्व के निर्माण में उनके परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

उनके पिता चाहते थे कि सुभाष अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करके उच्च सरकारी अधिकारी बनें। दूसरी ओर उनकी माता ने उनमें भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और राष्ट्रप्रेम के संस्कार विकसित किए।

इसी कारण उनके व्यक्तित्व में एक ओर आधुनिक शिक्षा का प्रभाव दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर भारतीय परंपरा और आध्यात्मिक चिंतन की गहरी छाप भी स्पष्ट दिखाई देती है।


बचपन एवं व्यक्तित्व

सुभाष बचपन से ही अत्यंत मेधावी, अनुशासित और गंभीर स्वभाव के थे। वे सामान्य बच्चों की अपेक्षा अधिक अध्ययनशील थे तथा आत्मचिंतन में रुचि रखते थे।

उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ थीं—

  • अद्भुत आत्मविश्वास
  • दृढ़ इच्छाशक्ति
  • अनुशासनप्रियता
  • राष्ट्रप्रेम
  • नेतृत्व क्षमता
  • संगठन कौशल
  • आध्यात्मिक झुकाव
  • त्याग एवं बलिदान की भावना

यही गुण आगे चलकर उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में स्थापित करते हैं।


स्वामी विवेकानन्द एवं रामकृष्ण परमहंस का प्रभाव

सुभाष चन्द्र बोस के जीवन पर स्वामी विवेकानन्द का अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा।

किशोरावस्था में उन्होंने विवेकानन्द के लेख, भाषण और पत्रों का गहन अध्ययन किया। विवेकानन्द के राष्ट्रवाद, चरित्र निर्माण, आत्मबल, सेवा और कर्मयोग के विचारों ने सुभाष को अत्यधिक प्रभावित किया।

उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि यदि स्वामी विवेकानन्द जीवित होते तो वे उन्हें अपना गुरु बनाते।

रामकृष्ण परमहंस की आध्यात्मिक शिक्षाओं ने भी उनके व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की। यही कारण है कि वे राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक दायित्व मानते थे।


प्रारम्भिक शिक्षा

सुभाष चन्द्र बोस की प्रारम्भिक शिक्षा कटक के प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल (वर्तमान Stewart School) में हुई।

उस समय इस विद्यालय में मुख्यतः यूरोपीय विद्यार्थियों को प्राथमिकता दी जाती थी। यहाँ अध्ययन के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को निकट से देखा।

बाद में उन्होंने रेवेन्सॉ कॉलेजिएट स्कूल (Ravenshaw Collegiate School) में प्रवेश लिया। यही वह विद्यालय था जहाँ उनके व्यक्तित्व का वास्तविक विकास प्रारम्भ हुआ।

विद्यालय के प्रधानाचार्य बेनी माधव दास ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। बेनी माधव दास केवल शिक्षक नहीं थे, बल्कि राष्ट्रवादी विचारों के समर्थक भी थे। उन्होंने विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण, सेवा भावना और देशभक्ति का विकास किया।

सुभाष बाद में लिखते हैं कि बेनी माधव दास उनके जीवन के सबसे प्रेरणादायक शिक्षकों में से एक थे।


उच्च शिक्षा

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया।

यह उस समय भारत के सबसे प्रतिष्ठित महाविद्यालयों में से एक था।

यहीं से उनके जीवन में पहला बड़ा राजनीतिक मोड़ आया।


प्रोफेसर ओटेन (Oaten) घटना

1916 में प्रेसिडेंसी कॉलेज में अंग्रेज प्रोफेसर ई. एफ. ओटेन (E. F. Oaten) पर भारतीय छात्रों का अपमान करने का आरोप लगा।

एक दिन प्रोफेसर पर कुछ विद्यार्थियों ने हमला कर दिया।

इस घटना में सुभाष चन्द्र बोस का नाम भी जोड़ा गया, यद्यपि उनके प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं था।

फिर भी कॉलेज प्रशासन ने उन्हें निष्कासित (Rusticate) कर दिया।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

  • यह घटना भारतीय छात्रों के आत्मसम्मान से जुड़ी मानी जाती है।
  • इस घटना के बाद सुभाष के भीतर अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध और अधिक मजबूत हुआ।
  • निष्कासन के कारण उनकी शिक्षा कुछ समय के लिए बाधित हुई।

स्कॉटिश चर्च कॉलेज

प्रेसिडेंसी कॉलेज से निष्कासन के बाद उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कलकत्ता में प्रवेश लिया।

यहाँ से उन्होंने दर्शनशास्त्र (Philosophy) विषय में स्नातक की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की।

दर्शनशास्त्र के अध्ययन ने उनके तार्किक चिंतन, नैतिक दृष्टिकोण और नेतृत्व क्षमता को और अधिक विकसित किया।


इंग्लैंड की यात्रा

उनके पिता चाहते थे कि वे भारतीय सिविल सेवा (ICS) में जाएँ।

इसी उद्देश्य से सुभाष 1919 में इंग्लैंड गए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से संबद्ध Fitzwilliam Hall (अब Fitzwilliam College) में अध्ययन प्रारम्भ किया।

यहीं उन्होंने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की।


भारतीय सिविल सेवा (ICS) क्या थी?

ब्रिटिश शासन के समय Indian Civil Service (ICS) भारत की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा थी।

इसे “ब्रिटिश साम्राज्य की स्टील फ्रेम (Steel Frame of British Administration)” कहा जाता था।

ICS अधिकारी—

  • जिला कलेक्टर
  • कमिश्नर
  • सचिव
  • उच्च प्रशासनिक पदों

पर नियुक्त होते थे।

उस समय किसी भारतीय के लिए इस परीक्षा को उत्तीर्ण करना अत्यंत कठिन माना जाता था।


भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा

सुभाष चन्द्र बोस के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ भारतीय सिविल सेवा (Indian Civil Service – ICS) परीक्षा थी। उस समय ICS को ब्रिटिश भारत की सबसे प्रतिष्ठित और शक्तिशाली प्रशासनिक सेवा माना जाता था। इसे ब्रिटिश शासन की “Steel Frame of Administration” कहा जाता था क्योंकि पूरे भारत का प्रशासन मुख्यतः ICS अधिकारियों के हाथों में होता था।

ICS परीक्षा इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी?

आज जिस प्रकार भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) को भारत की सर्वोच्च सिविल सेवा माना जाता है, उसी प्रकार ब्रिटिश शासन में ICS सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा थी। अंतर केवल इतना था कि उस समय यह सेवा ब्रिटिश सरकार के अधीन कार्य करती थी।

ICS अधिकारियों के प्रमुख कार्य थे—

  • जिले का प्रशासन चलाना।
  • कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना।
  • भूमि राजस्व (Land Revenue) की वसूली।
  • न्यायिक एवं कार्यपालिका संबंधी अधिकारों का प्रयोग।
  • ब्रिटिश नीतियों को लागू करना।

उस समय किसी भारतीय के लिए इस परीक्षा को उत्तीर्ण करना अत्यंत कठिन था क्योंकि—

  • परीक्षा इंग्लैंड में आयोजित होती थी।
  • प्रतियोगिता बहुत कठिन होती थी।
  • अधिकांश परीक्षार्थी अंग्रेज होते थे।
  • भारतीयों के प्रति भेदभाव भी देखा जाता था।

सुभाष चन्द्र बोस की ICS परीक्षा में सफलता

1919 में इंग्लैंड जाने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन करते हुए ICS परीक्षा की तैयारी प्रारम्भ की।

उन्होंने अत्यंत कम समय में तैयारी की और 1920 में आयोजित भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में चौथा स्थान (Fourth Rank) प्राप्त किया।

यह उपलब्धि असाधारण मानी जाती है क्योंकि उस समय बहुत कम भारतीय इस परीक्षा में सफल हो पाते थे।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यजानकारी
परीक्षा वर्ष1920
प्राप्त स्थानचौथा (4th Rank)
प्रशिक्षणइंग्लैंड
सेवाIndian Civil Service (ICS)
त्यागपत्र1921

सुभाष चन्द्र बोस ने ICS से त्यागपत्र क्यों दिया?

ICS में चयन होने के बाद उनके सामने जीवन का सबसे कठिन निर्णय था। एक ओर प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी थी, दूसरी ओर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष।

सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि—

“मैं एक साथ ब्रिटिश साम्राज्य का सेवक और भारत माता का सच्चा सेवक नहीं बन सकता।”

उन्होंने अनुभव किया कि यदि वे ब्रिटिश सरकार की सेवा करेंगे तो उन्हें उसी शासन के लिए कार्य करना होगा जिसके विरुद्ध भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था।

इसी कारण उन्होंने 22 अप्रैल 1921 को ICS से औपचारिक रूप से त्यागपत्र दे दिया।

यह त्यागपत्र भारतीय युवाओं के लिए राष्ट्रसेवा का प्रेरणास्रोत बन गया।

UPSC/SSC तथ्य

  • सुभाष चन्द्र बोस ने ICS परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया।
  • यह त्यागपत्र राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।
  • उस समय इतनी प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ना अत्यंत साहसिक निर्णय माना गया।

भारत वापसी

1921 में भारत लौटने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने का निर्णय लिया।

भारत लौटने के समय पूरे देश में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) चल रहा था। देशभर में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, सरकारी नौकरियों का त्याग, विद्यालयों और न्यायालयों का बहिष्कार जैसे कार्यक्रम चल रहे थे।

ऐसे वातावरण में सुभाष ने निश्चय किया कि वे अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित करेंगे।


महात्मा गांधी से पहली मुलाकात

भारत लौटने के कुछ समय बाद सुभाष चन्द्र बोस ने बंबई (वर्तमान मुंबई) में महात्मा गांधी से मुलाकात की।

वे गांधीजी के नेतृत्व और जनजागरण की क्षमता से प्रभावित हुए, किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के तरीकों को लेकर उनके मन में कुछ प्रश्न भी थे।

सुभाष का मानना था कि यदि अंग्रेज शांतिपूर्ण आंदोलनों से भारत को स्वतंत्र नहीं करते हैं, तो अधिक कठोर और संगठित संघर्ष की आवश्यकता होगी।

यहीं से गांधी और बोस के विचारों में सूक्ष्म अंतर दिखाई देने लगा, जो बाद में कांग्रेस के भीतर बड़े वैचारिक मतभेद का कारण बना।


चित्तरंजन दास (C. R. Das) से मुलाकात

महात्मा गांधी से मिलने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने बंगाल के महान राष्ट्रवादी नेता देशबंधु चित्तरंजन दास (C. R. Das) से भेंट की।

यह मुलाकात उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।

सुभाष ने चित्तरंजन दास को अपना राजनीतिक गुरु (Political Mentor) माना।

चित्तरंजन दास का प्रभाव

देशबंधु दास ने सुभाष को सिखाया कि—

  • राजनीति केवल भाषण देने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की सेवा का साधन है।
  • संगठन किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति होता है।
  • युवाओं की भागीदारी के बिना स्वतंत्रता आंदोलन सफल नहीं हो सकता।

चित्तरंजन दास के नेतृत्व में सुभाष ने संगठन, प्रशासन और जनसंपर्क का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया।


राष्ट्रीय कॉलेज, कलकत्ता के प्राचार्य

असहयोग आंदोलन के दौरान जब अनेक विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया, तब राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नेशनल कॉलेज, कलकत्ता की स्थापना की गई।

चित्तरंजन दास ने सुभाष चन्द्र बोस को इस कॉलेज का प्राचार्य (Principal) नियुक्त किया।

यद्यपि उनकी आयु बहुत कम थी, फिर भी उन्होंने इस दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन किया।

यह उनके प्रशासनिक कौशल और नेतृत्व क्षमता का प्रारम्भिक उदाहरण था।


कलकत्ता नगर निगम (Calcutta Municipal Corporation)

1924 में जब चित्तरंजन दास कलकत्ता नगर निगम के महापौर (Mayor) बने, तब उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer – CEO) नियुक्त किया।

इस पद पर रहते हुए सुभाष ने—

  • नगर प्रशासन में सुधार किए।
  • स्वच्छता व्यवस्था को बेहतर बनाया।
  • कर्मचारियों में अनुशासन स्थापित किया।
  • प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया।

इस अनुभव ने उन्हें भविष्य में बड़े संगठन चलाने के लिए तैयार किया।


पहली गिरफ्तारी

ब्रिटिश सरकार सुभाष चन्द्र बोस की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित थी।

1924 में उन्हें राष्ट्रवादी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और बिना मुकदमे के मांडले जेल (बर्मा) भेज दिया गया।

उस समय बर्मा (वर्तमान म्यांमार) ब्रिटिश भारत का ही हिस्सा था।


मांडले जेल का जीवन

मांडले जेल का वातावरण अत्यंत कठिन था। यहाँ—

  • अत्यधिक गर्मी रहती थी।
  • स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित थीं।
  • भोजन की गुणवत्ता खराब थी।
  • राजनीतिक कैदियों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता था।

जेल में रहने के दौरान उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हुआ और उन्हें क्षय रोग (Tuberculosis) होने की आशंका भी व्यक्त की गई। स्वास्थ्य खराब होने पर 1927 में उन्हें रिहा कर दिया गया।


जेल से रिहाई के बाद

रिहाई के बाद सुभाष चन्द्र बोस पहले से अधिक सक्रिय हो गए।

उन्होंने युवाओं को संगठित करना प्रारम्भ किया और पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना फैलाने का कार्य किया।

उनकी प्रभावशाली वाणी, संगठन क्षमता और साहस के कारण वे शीघ्र ही कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय युवा नेताओं में शामिल हो गए।


जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस

1920 और 1930 के दशक में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस दोनों कांग्रेस के युवा एवं प्रगतिशील नेताओं के रूप में उभरे।

दोनों में कई समानताएँ थीं—

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण
  • औद्योगीकरण का समर्थन
  • समाजवादी आर्थिक विचार
  • पूर्ण स्वतंत्रता (Purna Swaraj) की मांग

हालाँकि बाद के वर्षों में रणनीति और संगठनात्मक प्रश्नों पर दोनों के विचार अलग-अलग दिखाई देने लगे।


सविनय अवज्ञा आंदोलन में भूमिका

1930 में महात्मा गांधी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ किया गया।

सुभाष चन्द्र बोस ने इस आंदोलन का समर्थन किया और विभिन्न राष्ट्रीय गतिविधियों में भाग लिया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया।

लगातार जेल यात्राओं के बावजूद उनका उत्साह कम नहीं हुआ। इसके विपरीत, उनकी लोकप्रियता पूरे देश में तेजी से बढ़ती गई।


  • 1920 में ICS परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।
  • 1921 में ICS से त्यागपत्र दिया।
  • चित्तरंजन दास उनके राजनीतिक गुरु थे।
  • नेशनल कॉलेज, कलकत्ता के प्राचार्य रहे।
  • कलकत्ता नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने।
  • 1924 में गिरफ्तार होकर मांडले जेल भेजे गए।
  • 1927 में स्वास्थ्य कारणों से रिहा हुए।
  • 1930 के दशक तक कांग्रेस के प्रमुख युवा नेताओं में शामिल हो चुके थे।

1930 के दशक में सुभाष चन्द्र बोस का राजनीतिक उदय

1930 का दशक सुभाष चन्द्र बोस के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल माना जाता है। इसी अवधि में वे एक क्षेत्रीय नेता से राष्ट्रीय स्तर के नेता बने। उनकी संगठन क्षमता, प्रशासनिक दक्षता, प्रभावशाली भाषण शैली और दृढ़ राष्ट्रवादी विचारधारा ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शामिल कर दिया।

इस समय भारत में एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में जनआंदोलन चल रहे थे, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर युवाओं का एक वर्ग ऐसा था जो अंग्रेजों के विरुद्ध अधिक आक्रामक और निर्णायक नीति अपनाना चाहता था। सुभाष चन्द्र बोस इस विचारधारा के प्रमुख प्रतिनिधि बनकर उभरे।


यूरोप यात्रा और स्वास्थ्य लाभ (1933–1936)

लगातार जेल यात्राओं के कारण सुभाष चन्द्र बोस का स्वास्थ्य काफी खराब हो गया था। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें उपचार के लिए यूरोप जाने की अनुमति दी।

यूरोप में उन्होंने कई देशों का दौरा किया, जिनमें प्रमुख थे—

  • ऑस्ट्रिया
  • जर्मनी
  • इटली
  • आयरलैंड
  • चेकोस्लोवाकिया
  • फ्रांस

इस यात्रा का उद्देश्य केवल स्वास्थ्य लाभ नहीं था, बल्कि विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक नीतियों और राष्ट्रवादी आंदोलनों का अध्ययन करना भी था।

उन्होंने यूरोप में अनेक राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों और भारतीय प्रवासियों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का भी प्रयास किया।


“The Indian Struggle” पुस्तक

यूरोप प्रवास के दौरान सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Indian Struggle (1920–1934) लिखी।

इस पुस्तक में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की घटनाओं, कांग्रेस की नीतियों तथा ब्रिटिश शासन की आलोचना का विस्तृत वर्णन किया।

पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ

  • भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का विश्लेषण
  • गांधीजी की भूमिका का मूल्यांकन
  • क्रांतिकारी आंदोलनों का उल्लेख
  • ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना
  • भविष्य की रणनीति पर विचार

परीक्षा हेतु तथ्य

ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक पर भारत में प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि इसमें औपनिवेशिक शासन की तीखी आलोचना की गई थी।


भारत वापसी

1936 में सुभाष चन्द्र बोस भारत लौटे।

भारत लौटते ही उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद स्वास्थ्य कारणों से रिहा किया गया।

रिहाई के बाद वे पुनः कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हो गए। इस समय तक वे राष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत लोकप्रिय नेता बन चुके थे।


हरिपुरा अधिवेशन (1938)

हरिपुरा अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

यह अधिवेशन फरवरी 1938 में गुजरात के हरिपुरा गाँव में आयोजित किया गया।

सुभाष चन्द्र बोस सर्वसम्मति से कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।

विषयजानकारी
अधिवेशनहरिपुरा
वर्ष1938
स्थानगुजरात
अध्यक्षसुभाष चन्द्र बोस

हरिपुरा अध्यक्षीय भाषण

सुभाष चन्द्र बोस का हरिपुरा भाषण कांग्रेस के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यक्षीय भाषणों में माना जाता है।

इस भाषण में उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र भारत केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नहीं होना चाहिए, बल्कि आर्थिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी शक्तिशाली होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि—

  • गरीबी समाप्त करनी होगी।
  • वैज्ञानिक विकास आवश्यक है।
  • बड़े उद्योग स्थापित किए जाने चाहिए।
  • आधुनिक सेना का निर्माण होना चाहिए।
  • राष्ट्रीय योजना बननी चाहिए।

उनकी सोच उस समय के लिए अत्यंत आधुनिक मानी जाती थी।


राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee)

हरिपुरा अधिवेशन के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने भारत के आर्थिक विकास के लिए National Planning Committee के गठन का प्रस्ताव रखा।

बाद में इस समिति की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू को सौंपी गई।

समिति के उद्देश्य

  • औद्योगिक विकास
  • कृषि सुधार
  • ऊर्जा उत्पादन
  • वैज्ञानिक अनुसंधान
  • रोजगार सृजन
  • राष्ट्रीय संसाधनों का उचित उपयोग

अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाता है—

राष्ट्रीय योजना समिति के गठन का प्रस्ताव किस कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में रखा गया था?

उत्तर — सुभाष चन्द्र बोस (हरिपुरा अधिवेशन, 1938)


सुभाष चन्द्र बोस की आर्थिक विचारधारा

उनका मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी।

उन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए निम्न विचार प्रस्तुत किए—

  • योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था
  • बड़े उद्योगों का विकास
  • वैज्ञानिक अनुसंधान
  • आधुनिक तकनीक का उपयोग
  • मजबूत रक्षा व्यवस्था
  • श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा

इन विचारों का प्रभाव बाद में स्वतंत्र भारत की पंचवर्षीय योजनाओं और औद्योगिक विकास की नीतियों में भी देखा गया।


युवाओं के प्रिय नेता

हरिपुरा अधिवेशन के बाद सुभाष चन्द्र बोस युवाओं के सबसे लोकप्रिय नेता बन गए।

उनकी लोकप्रियता के प्रमुख कारण थे—

  • प्रभावशाली भाषण
  • साहसी व्यक्तित्व
  • तेज निर्णय क्षमता
  • आधुनिक सोच
  • पूर्ण स्वतंत्रता की स्पष्ट मांग
  • अनुशासन और संगठन पर बल

कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद

यद्यपि सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी दोनों का लक्ष्य भारत की स्वतंत्रता था, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्त करने के तरीकों को लेकर दोनों के विचारों में अंतर था।

गांधीजी अहिंसात्मक जनआंदोलन को सर्वोत्तम मार्ग मानते थे।

दूसरी ओर सुभाष का विचार था कि यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ अनुकूल हों और आवश्यकता पड़े, तो अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष सहित सभी विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।

यह मतभेद धीरे-धीरे कांग्रेस के भीतर दो अलग-अलग विचारधाराओं के रूप में सामने आया।


गांधी और सुभाष चन्द्र बोस के विचारों में अंतर

विषयमहात्मा गांधीसुभाष चन्द्र बोस
संघर्ष का तरीकाअहिंसात्मक सत्याग्रहआवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र संघर्ष भी
आर्थिक दृष्टिकोणग्राम स्वराज, कुटीर उद्योगऔद्योगीकरण एवं भारी उद्योग
विकास मॉडलविकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्थायोजनाबद्ध राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था
सेनासीमित महत्वआधुनिक एवं शक्तिशाली राष्ट्रीय सेना
स्वतंत्रता की रणनीतिचरणबद्ध जनआंदोलनतेज, संगठित एवं निर्णायक संघर्ष
अंतरराष्ट्रीय सहयोगसीमितब्रिटेन के विरोधी देशों से भी सहयोग लेने के पक्षधर

महत्वपूर्ण तथ्य: दोनों नेताओं के विचारों में मतभेद थे, लेकिन दोनों का अंतिम उद्देश्य भारत की पूर्ण स्वतंत्रता था। प्रतियोगी परीक्षाओं में इस विषय को संतुलित दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।


1939 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव की पृष्ठभूमि

1939 में कांग्रेस के अगले अध्यक्ष के चुनाव का समय आया।

महात्मा गांधी ने डॉ. पट्टाभि सीतारमैया का समर्थन किया।

दूसरी ओर सुभाष चन्द्र बोस ने पुनः अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

यह चुनाव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास का सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण चुनाव माना जाता है क्योंकि पहली बार कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आए।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

  • 1933–1936 के बीच सुभाष चन्द्र बोस यूरोप में रहे।
  • उन्होंने The Indian Struggle पुस्तक लिखी।
  • 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष बने।
  • राष्ट्रीय योजना समिति के गठन का प्रस्ताव उनके अध्यक्षीय कार्यकाल में रखा गया।
  • समिति की अध्यक्षता बाद में जवाहरलाल नेहरू ने की।
  • सुभाष चन्द्र बोस योजनाबद्ध आर्थिक विकास और औद्योगीकरण के समर्थक थे।
  • 1939 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी डॉ. पट्टाभि सीतारमैया थे।

त्रिपुरी अधिवेशन (1939)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में त्रिपुरी अधिवेशन (Tripuri Session, 1939) एक ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। यही वह अधिवेशन था जहाँ सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी के बीच लंबे समय से चल रहे वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आए। इस अधिवेशन के बाद कांग्रेस की राजनीति में बड़ा परिवर्तन आया और अंततः सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस छोड़कर एक नए राजनीतिक संगठन फॉरवर्ड ब्लॉक (Forward Bloc) की स्थापना की।

UPSC, SSC, State PSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में त्रिपुरी अधिवेशन से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।


त्रिपुरी अधिवेशन कहाँ और कब हुआ?

विषयजानकारी
अधिवेशनत्रिपुरी अधिवेशन
वर्ष1939
तिथिमार्च 1939
स्थानत्रिपुरी (वर्तमान जबलपुर, मध्य प्रदेश के निकट)
अध्यक्षीय चुनावसुभाष चन्द्र बोस

1939 का कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव

1938 के हरिपुरा अधिवेशन में सफल अध्यक्ष रहने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने 1939 में पुनः कांग्रेस अध्यक्ष बनने का निर्णय लिया।

उस समय कांग्रेस के अधिकांश वरिष्ठ नेता महात्मा गांधी के प्रभाव में थे। गांधीजी चाहते थे कि अध्यक्ष पद पर डॉ. पट्टाभि सीतारमैया चुने जाएँ।

इस प्रकार चुनाव दो प्रमुख उम्मीदवारों के बीच हुआ—

  • सुभाष चन्द्र बोस
  • डॉ. पट्टाभि सीतारमैया (महात्मा गांधी के समर्थित उम्मीदवार)

चुनाव परिणाम

कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में सुभाष चन्द्र बोस विजयी हुए।

उम्मीदवारपरिणाम
सुभाष चन्द्र बोसविजयी
डॉ. पट्टाभि सीतारमैयापराजित

यह कांग्रेस के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण चुनाव था क्योंकि गांधीजी द्वारा समर्थित उम्मीदवार पहली बार अध्यक्ष पद का चुनाव हार गया।


महात्मा गांधी की प्रतिक्रिया

चुनाव परिणाम आने के बाद महात्मा गांधी ने कहा—

“पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है।”

यह कथन भारतीय राजनीति के इतिहास में अत्यंत प्रसिद्ध है।

इसका अर्थ यह नहीं था कि गांधीजी व्यक्तिगत रूप से पराजित हुए थे, बल्कि उनका आशय यह था कि कांग्रेस के अधिकांश कार्यकर्ताओं ने उनके सुझाए हुए उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया।


चुनाव के बाद उत्पन्न संकट

यद्यपि सुभाष चन्द्र बोस चुनाव जीत गए थे, लेकिन कांग्रेस की कार्यसमिति (Working Committee) के अधिकांश सदस्य गांधीजी के समर्थक थे।

कार्यसमिति के प्रमुख नेताओं में शामिल थे—

  • सरदार वल्लभभाई पटेल
  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
  • राजगोपालाचारी
  • राजेन्द्र प्रसाद
  • अन्य वरिष्ठ गांधीवादी नेता

इनमें से अधिकांश नेताओं ने सुभाष चन्द्र बोस के साथ कार्य करने में असहमति व्यक्त की।

परिणामस्वरूप कांग्रेस के भीतर गंभीर संगठनात्मक संकट उत्पन्न हो गया।


सुभाष चन्द्र बोस की स्वास्थ्य स्थिति

त्रिपुरी अधिवेशन के समय सुभाष चन्द्र बोस गंभीर रूप से बीमार थे।

उन्हें तेज बुखार था, फिर भी उन्होंने अधिवेशन में भाग लिया क्योंकि वे कांग्रेस की एकता बनाए रखना चाहते थे।

इतिहासकारों का मत है कि बीमारी के बावजूद उन्होंने अत्यंत धैर्य और संयम का परिचय दिया।


कांग्रेस कार्यसमिति का विवाद

अध्यक्ष बनने के बाद सुभाष चन्द्र बोस अपनी पसंद की नई कार्यसमिति बनाना चाहते थे।

दूसरी ओर गांधीजी के समर्थक चाहते थे कि कार्यसमिति गांधीजी की सलाह के अनुसार ही बने।

यह विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि कांग्रेस के कार्यों में गतिरोध उत्पन्न हो गया।


सुभाष चन्द्र बोस के सामने चुनौतियाँ

अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा—

  • कार्यसमिति का सहयोग नहीं मिला।
  • वरिष्ठ नेताओं का समर्थन सीमित था।
  • कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद बढ़ गए।
  • संगठनात्मक कार्य प्रभावित होने लगे।

इन परिस्थितियों में उनके लिए अध्यक्ष के रूप में प्रभावी ढंग से कार्य करना कठिन हो गया।


कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा

लगातार बढ़ते मतभेदों और संगठनात्मक संकट के कारण सुभाष चन्द्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

उनके इस्तीफे के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्नउत्तर
सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा कब दिया?29 अप्रैल 1939
उनके बाद कांग्रेस अध्यक्ष कौन बने?डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

क्या गांधी और बोस विरोधी थे?

यह प्रतियोगी परीक्षाओं तथा सामान्य अध्ययन में अक्सर गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाने वाला विषय है।

वास्तविकता यह है कि—

  • दोनों भारत की पूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे।
  • दोनों एक-दूसरे के राष्ट्रप्रेम का सम्मान करते थे।
  • मतभेद मुख्यतः स्वतंत्रता प्राप्त करने की रणनीति को लेकर थे।
  • गांधीजी अहिंसात्मक जनआंदोलन के पक्षधर थे।
  • सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि यदि आवश्यकता हो तो अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का लाभ उठाकर सशस्त्र संघर्ष भी किया जा सकता है।

अतः यह कहना उचित नहीं होगा कि दोनों व्यक्तिगत शत्रु थे। उनके बीच वैचारिक मतभेद थे, व्यक्तिगत शत्रुता नहीं।


फॉरवर्ड ब्लॉक (Forward Bloc)

कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद भी सुभाष चन्द्र बोस ने राष्ट्रीय आंदोलन से स्वयं को अलग नहीं किया।

उन्होंने कांग्रेस के भीतर मौजूद राष्ट्रवादी, समाजवादी और वामपंथी विचारधारा वाले नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाने का निर्णय लिया।

इसी उद्देश्य से उन्होंने 3 मई 1939 को ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (All India Forward Bloc) की स्थापना की।


फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना

विषयजानकारी
स्थापना3 मई 1939
संस्थापकसुभाष चन्द्र बोस
उद्देश्यकांग्रेस के भीतर राष्ट्रवादी शक्तियों का एकीकरण
मुख्यालय (प्रारंभिक)कलकत्ता

फॉरवर्ड ब्लॉक के उद्देश्य

फॉरवर्ड ब्लॉक का मुख्य उद्देश्य केवल एक नया राजनीतिक दल बनाना नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक सक्रिय और प्रभावी बनाना था।

इसके प्रमुख उद्देश्य थे—

  1. भारत की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना।
  2. ब्रिटिश शासन का निर्णायक विरोध करना।
  3. युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना।
  4. किसानों और श्रमिकों के हितों की रक्षा करना।
  5. योजनाबद्ध आर्थिक विकास का समर्थन करना।
  6. राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना।
  7. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक भारत का निर्माण करना।

फॉरवर्ड ब्लॉक की विचारधारा

सुभाष चन्द्र बोस का विश्वास था कि स्वतंत्र भारत—

  • आधुनिक होना चाहिए।
  • वैज्ञानिक होना चाहिए।
  • आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए।
  • सामाजिक न्याय पर आधारित होना चाहिए।
  • सैन्य दृष्टि से मजबूत होना चाहिए।

इसी कारण फॉरवर्ड ब्लॉक की विचारधारा में राष्ट्रवाद, समाजवाद, सामाजिक न्याय और आर्थिक नियोजन के तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।


ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया

फॉरवर्ड ब्लॉक की बढ़ती लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई।

सुभाष चन्द्र बोस के भाषणों और जनसभाओं पर निगरानी रखी जाने लगी।

उनकी गतिविधियों को सीमित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कई बार उन्हें गिरफ्तार किया।


1940 में गिरफ्तारी

जुलाई 1940 में ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस को पुनः गिरफ्तार कर लिया।

उन्हें कोलकाता की प्रेसीडेंसी जेल में रखा गया।

जेल में उन्होंने भूख हड़ताल (Hunger Strike) प्रारम्भ कर दी।

उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और जनता के बढ़ते समर्थन को देखते हुए सरकार ने उन्हें जेल से रिहा तो कर दिया, लेकिन उनके घर पर नजरबंद (House Arrest) कर दिया।

यही नजरबंदी आगे चलकर भारतीय इतिहास की सबसे साहसिक घटनाओं में से एक—महान पलायन (Great Escape)—का कारण बनी।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

  • त्रिपुरी अधिवेशन – 1939।
  • स्थान – त्रिपुरी (वर्तमान जबलपुर के निकट, मध्य प्रदेश)।
  • गांधीजी के उम्मीदवार – डॉ. पट्टाभि सीतारमैया।
  • चुनाव विजेता – सुभाष चन्द्र बोस।
  • गांधीजी का प्रसिद्ध कथन – “पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है।”
  • सुभाष चन्द्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।
  • उनके बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कांग्रेस अध्यक्ष बने।
  • 3 मई 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।
  • जुलाई 1940 में पुनः गिरफ्तार हुए।
  • जेल में भूख हड़ताल की।
  • बाद में घर में नजरबंद कर दिए गए।

1940 की गिरफ्तारी और नजरबंदी

फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनसभाएँ और आंदोलन प्रारम्भ कर दिए। वे मानते थे कि यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) शुरू हो चुका है और यही समय है जब भारत को अपनी स्वतंत्रता के लिए निर्णायक संघर्ष करना चाहिए।

ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि यदि सुभाष चन्द्र बोस स्वतंत्र रहे, तो वे युद्ध की परिस्थिति का लाभ उठाकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। इसलिए जुलाई 1940 में उन्हें Defence of India Rules के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया।

जेल में उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी। उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और जनता में बढ़ते आक्रोश को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें रिहा तो कर दिया, लेकिन यह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं थी।

उन्हें कोलकाता स्थित उनके पैतृक घर 38/2 एल्गिन रोड (वर्तमान नेताजी भवन) में कड़ी पुलिस निगरानी के साथ नजरबंद (House Arrest) कर दिया गया।


महान पलायन (The Great Escape)

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में जनवरी 1941 की यह घटना सबसे साहसिक घटनाओं में से एक मानी जाती है।

ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि कड़ी पुलिस निगरानी के कारण सुभाष चन्द्र बोस घर से बाहर नहीं निकल पाएँगे, लेकिन उन्होंने महीनों पहले ही अपनी पलायन योजना तैयार कर ली थी।

उनका उद्देश्य स्पष्ट था—

  • भारत से सुरक्षित बाहर निकलना।
  • ब्रिटेन के विरोधी देशों से सहयोग प्राप्त करना।
  • भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहायता जुटाना।

पलायन की तैयारी

पुलिस की निगरानी से बचने के लिए उन्होंने कई सप्ताह तक स्वयं को सार्वजनिक जीवन से लगभग अलग कर लिया।

उन्होंने—

  • बाहर निकलना लगभग बंद कर दिया।
  • दाढ़ी बढ़ा ली।
  • पहनावे में परिवर्तन किया।
  • उर्दू और कुछ पश्तो शब्दों का अभ्यास किया।
  • अपनी यात्रा का मार्ग गुप्त रखा।

इस योजना की जानकारी केवल परिवार के कुछ विश्वसनीय सदस्यों और निकट सहयोगियों को थी।


16–17 जनवरी 1941 की रात

16 जनवरी 1941 की रात (कुछ स्रोत 17 जनवरी की तड़के सुबह का उल्लेख करते हैं) सुभाष चन्द्र बोस अपने घर से गुप्त रूप से निकल गए।

उन्होंने एक लंबा भूरा कोट, पगड़ी तथा दाढ़ी वाला वेश धारण किया ताकि वे एक उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्र के मुस्लिम व्यक्ति या पठान जैसे दिखाई दें।

उन्होंने अपना वास्तविक नाम छिपाकर “मोहम्मद ज़ियाउद्दीन” (Mohammad Ziauddin) नाम का उपयोग किया।

कुछ विवरणों के अनुसार उन्होंने स्वयं को एक बीमा एजेंट (Insurance Inspector) के रूप में प्रस्तुत किया।


शिशिर कुमार बोस की भूमिका

महान पलायन की सफलता में उनके भतीजे डॉ. शिशिर कुमार बोस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

उन्होंने अपनी जर्मन निर्मित Wanderer कार से नेताजी को कोलकाता से गोमो (अब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस गोमो जंक्शन, झारखंड) तक पहुँचाया।

रास्ते में अनेक पुलिस चौकियाँ थीं, लेकिन किसी को भी यह संदेह नहीं हुआ कि कार में बैठे व्यक्ति स्वयं सुभाष चन्द्र बोस हैं।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्न: महान पलायन के समय सुभाष चन्द्र बोस को कार से गोमो तक किसने पहुँचाया?

उत्तर: डॉ. शिशिर कुमार बोस।


गोमो से आगे की यात्रा

गोमो रेलवे स्टेशन पहुँचने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने कालका मेल (Kalka Mail) में यात्रा की।

वहाँ से वे उत्तर भारत की ओर बढ़े और अंततः पेशावर पहुँचे।

यह पूरा मार्ग अत्यंत जोखिमपूर्ण था क्योंकि रेलवे स्टेशनों पर ब्रिटिश पुलिस लगातार उनकी तलाश कर रही थी।


पेशावर में सहयोग

पेशावर पहुँचने पर स्थानीय राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने उनकी सहायता की।

इस चरण में भगतराम तलवार (Bhagat Ram Talwar) ने मार्गदर्शक की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों से होकर अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँचने में सहायता की।

UPSC तथ्य: भगतराम तलवार एक अत्यंत रोचक ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे। बाद में यह भी सामने आया कि वे विभिन्न देशों की खुफिया एजेंसियों के संपर्क में रहे थे, इसलिए उनके जीवन का अध्ययन इतिहासकारों के लिए विशेष रुचि का विषय है।


अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा

पेशावर से सुभाष चन्द्र बोस गुप्त मार्गों से अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पहुँचे।

यह यात्रा अत्यंत कठिन थी क्योंकि—

  • पहाड़ी मार्ग थे।
  • ब्रिटिश गुप्तचर सक्रिय थे।
  • पहचान उजागर होने का खतरा बना हुआ था।

काबुल में उन्होंने कुछ सप्ताह तक गुप्त रूप से निवास किया।


काबुल में नई पहचान

काबुल में रहते समय उन्होंने विभिन्न पहचान-पत्रों का उपयोग किया।

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार आगे की यात्रा के लिए उन्हें एक इतालवी नाम “Orlando Mazzotta” से संबंधित यात्रा दस्तावेज़ उपलब्ध कराए गए, जिनकी सहायता से वे यूरोप की ओर बढ़ सके।


सोवियत संघ होते हुए जर्मनी

काबुल से वे सोवियत संघ (USSR) के मार्ग से जर्मनी पहुँचे।

उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था और जर्मनी ब्रिटेन का प्रमुख शत्रु था।

सुभाष चन्द्र बोस का विचार था कि—

“ब्रिटेन का शत्रु भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में संभावित सहयोगी बन सकता है।”

हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं था कि वे जर्मनी की समस्त नीतियों या विचारधारा का समर्थन करते थे। उनका मुख्य उद्देश्य केवल भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता प्राप्त करना था।


जर्मनी में सुभाष चन्द्र बोस

1941 में जर्मनी पहुँचने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने का कार्य प्रारम्भ किया।

उन्होंने वहाँ रहने वाले भारतीयों तथा युद्धबंदी भारतीय सैनिकों को संगठित करना शुरू किया।


फ्री इंडिया सेंटर (Free India Centre)

जर्मनी में उन्होंने Free India Centre की स्थापना की।

इसके प्रमुख उद्देश्य थे—

  • भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार।
  • यूरोप में रहने वाले भारतीयों को संगठित करना।
  • अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करना।
  • भारतीय युद्धबंदियों से संपर्क स्थापित करना।
  • भविष्य की स्वतंत्र भारतीय सरकार की रूपरेखा तैयार करना।

आज़ाद हिन्द रेडियो (Azad Hind Radio)

सुभाष चन्द्र बोस ने जर्मनी से Azad Hind Radio की स्थापना भी की।

इस रेडियो के माध्यम से वे भारत के लोगों को संबोधित करते थे।

उनके संदेश अनेक भाषाओं में प्रसारित किए जाते थे, जिनमें—

  • हिन्दी
  • अंग्रेज़ी
  • बंगाली
  • तमिल
  • तेलुगु
  • उर्दू
  • पश्तो

आदि शामिल थीं।

इन प्रसारणों का उद्देश्य भारतीय जनता और ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों में स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करना था।


भारतीय सेना के युद्धबंदियों का संगठन

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अनेक भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना की ओर से युद्ध लड़ रहे थे।

जर्मनी द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों से सुभाष चन्द्र बोस ने संपर्क स्थापित किया और उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित करने का प्रयास किया।

इसी प्रयास से आगे चलकर Indian Legion (इंडियन लीजन) का गठन हुआ, जिसे Free India Legion भी कहा जाता है।

यह आगे चलकर आज़ाद हिन्द फ़ौज की अवधारणा के विकास में महत्वपूर्ण चरण सिद्ध हुआ।


एडोल्फ हिटलर से मुलाकात

सुभाष चन्द्र बोस ने 1942 में जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर से भी मुलाकात की।

इस मुलाकात का उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता के लिए जर्मनी का सहयोग प्राप्त करना था।

हालाँकि जर्मनी की प्राथमिकता यूरोप का युद्ध था, इसलिए सुभाष चन्द्र बोस को अपेक्षित सैन्य सहायता नहीं मिल सकी।

इसी कारण उन्होंने अपना ध्यान दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर केंद्रित किया, जहाँ जापान की स्थिति अधिक मजबूत थी और बड़ी संख्या में भारतीय युद्धबंदी भी मौजूद थे।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्नउत्तर
महान पलायन कब हुआ?16–17 जनवरी 1941
नजरबंदी कहाँ थी?एल्गिन रोड, कोलकाता
पलायन के समय प्रयुक्त नाममोहम्मद ज़ियाउद्दीन
गोमो तक कार से किसने पहुँचाया?डॉ. शिशिर कुमार बोस
गोमो से कौन-सी ट्रेन पकड़ी?कालका मेल
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानीकाबुल
जर्मनी में स्थापित संगठनFree India Centre
जर्मनी से प्रारम्भ रेडियोAzad Hind Radio
भारतीय युद्धबंदियों से बनी इकाईIndian Legion (Free India Legion)
हिटलर से मुलाकात1942

Part -2

आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA) एवं आज़ाद हिन्द सरकार (Azad Hind Government) सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स | संगठन, सैन्य अभियान एवं स्वतंत्रता संग्राम में योगदान


परिचय

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आज़ाद हिन्द फ़ौज (Indian National Army – INA) का विशेष स्थान है। यह केवल एक सैन्य संगठन नहीं था, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के लिए विदेशों में संगठित किया गया पहला राष्ट्रीय सैन्य आंदोलन था। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में INA ने लाखों भारतीयों में यह विश्वास जगाया कि भारत अपनी स्वतंत्र सेना के बल पर भी स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है।

यद्यपि INA अंततः सैन्य दृष्टि से सफल नहीं हो सकी, लेकिन इसके सैनिकों का त्याग, बलिदान और देशभक्ति भारतीय जनता तथा ब्रिटिश भारतीय सेना पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ गई कि इतिहासकार मानते हैं कि इसने ब्रिटिश शासन की नींव को गंभीर रूप से हिला दिया।


आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA) क्या थी?

Indian National Army (INA) या आज़ाद हिन्द फ़ौज एक ऐसी सैन्य शक्ति थी जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करके भारत को स्वतंत्र कराना था।

इस सेना का गठन मुख्य रूप से उन भारतीय सैनिकों से किया गया था जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने ब्रिटिश सेना से युद्ध करते समय बंदी बनाया था।

इन सैनिकों ने बाद में भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने का निर्णय लिया।


आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना

यह तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछा जाता है।

INA का इतिहास दो चरणों में समझना चाहिए।

पहला चरण (1942)

  • संस्थापक — कैप्टन मोहन सिंह
  • स्थान — सिंगापुर
  • सहयोग — जापान

कैप्टन मोहन सिंह ने जापानी सेना द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों को संगठित कर पहली INA बनाई।


दूसरा चरण (1943)

1943 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचे।

रास बिहारी बोस ने उन्हें नेतृत्व सौंप दिया।

इसके बाद—

  • सेना का पुनर्गठन हुआ।
  • अनुशासन स्थापित किया गया।
  • सैनिक संख्या बढ़ी।
  • नई ब्रिगेड बनाई गईं।
  • महिलाओं की अलग रेजिमेंट बनाई गई।
  • स्पष्ट सैन्य लक्ष्य निर्धारित किए गए।

यही INA इतिहास में सबसे प्रसिद्ध है।


INA का मुख्य उद्देश्य

आज़ाद हिन्द फ़ौज का मुख्य उद्देश्य केवल सैन्य युद्ध करना नहीं था, बल्कि भारत में राष्ट्रीय क्रांति का वातावरण तैयार करना भी था।

इसके प्रमुख उद्देश्य थे—

  • भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कराना।
  • भारतीय सीमा में प्रवेश कर राष्ट्रीय विद्रोह प्रारम्भ करना।
  • भारतीय जनता को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित करना।
  • ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सैनिकों को अपनी ओर आकर्षित करना।
  • स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय सेना का निर्माण करना।

INA का ध्येय वाक्य (Motto)

आज़ाद हिन्द फ़ौज का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य था—

इत्तेफाक (एकता)
एतमाद (विश्वास)
कुर्बानी (बलिदान)

इन तीन शब्दों में पूरी INA की विचारधारा समाहित थी।


INA के प्रमुख नारे

नेताजी ने अनेक प्रेरणादायक नारे दिए।

सबसे प्रसिद्ध नारे—

  • जय हिन्द
  • दिल्ली चलो
  • तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा
  • इत्तेफाक, एतमाद, कुर्बानी

आज “जय हिन्द” भारत का सबसे लोकप्रिय राष्ट्रीय अभिवादन बन चुका है।


INA का ध्वज (Flag)

आज़ाद हिन्द फ़ौज का ध्वज भारतीय राष्ट्रीय ध्वज से प्रेरित था।

ध्वज की विशेषताएँ—

  • केसरिया
  • सफेद
  • हरा

मध्य भाग में उछलता हुआ बाघ (Springing Tiger) बनाया गया था।

बाघ का महत्व

  • साहस
  • शक्ति
  • आक्रमण
  • स्वतंत्रता

का प्रतीक माना गया।


INA का प्रतीक चिन्ह

INA के प्रतीक में उछलता हुआ बाघ यह दर्शाता था कि भारत अब केवल स्वतंत्रता की मांग नहीं करेगा बल्कि उसे प्राप्त करने के लिए संघर्ष भी करेगा।


INA की संगठनात्मक संरचना

नेताजी ने सेना का आधुनिक सैन्य ढांचे के अनुसार पुनर्गठन किया।

INA में—

  • मुख्यालय
  • कमांड मुख्यालय
  • ब्रिगेड
  • चिकित्सा विभाग
  • महिला रेजिमेंट
  • खुफिया विभाग
  • प्रचार विभाग
  • रसद विभाग

आदि अलग-अलग इकाइयाँ थीं।

यह संगठन उस समय की परिस्थितियों के अनुसार अत्यंत सुव्यवस्थित माना जाता था।


INA की प्रमुख ब्रिगेड

नेताजी ने सेना की विभिन्न ब्रिगेडों का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेताओं के सम्मान में रखा।

1. गांधी ब्रिगेड

इस ब्रिगेड का नाम महात्मा गांधी के सम्मान में रखा गया।

यह इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद नेताजी गांधीजी के राष्ट्रीय योगदान का सम्मान करते थे।


2. नेहरू ब्रिगेड

जवाहरलाल नेहरू के नाम पर बनाई गई।


3. आज़ाद ब्रिगेड

इस ब्रिगेड का नाम मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के सम्मान में रखा गया।


4. सुभाष ब्रिगेड

यह INA की सबसे महत्वपूर्ण युद्धक ब्रिगेडों में से एक थी।

भारत की सीमा की ओर बढ़ने वाले अभियानों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


INA में महिलाओं की भूमिका

यह नेताजी की सबसे आधुनिक सोच का उदाहरण था।

उनका मानना था कि—

“भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष पुरुषों और महिलाओं दोनों का समान संघर्ष है।”

इसी विचार से उन्होंने महिलाओं के लिए अलग सैन्य रेजिमेंट बनाने का निर्णय लिया।


रानी झाँसी रेजिमेंट

विश्व इतिहास में महिलाओं की सबसे प्रसिद्ध सैन्य इकाइयों में से एक रानी झाँसी रेजिमेंट थी।

इसका नाम 1857 की महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में रखा गया।

स्थापना

1943

संस्थापक

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

कमांडर

कैप्टन (डॉ.) लक्ष्मी सहगल


डॉ. लक्ष्मी सहगल

संक्षिप्त परिचय

  • जन्म – 1914
  • पेशा – चिकित्सक
  • INA में – रानी झाँसी रेजिमेंट की कमांडर
  • स्वतंत्रता के बाद – समाजसेवा एवं चिकित्सा सेवा

वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रेरणादायक महिला नेताओं में से एक मानी जाती हैं।


रानी झाँसी रेजिमेंट का महत्व

इस रेजिमेंट का महत्व केवल सैन्य दृष्टि से नहीं था।

इसने यह संदेश दिया कि—

  • महिलाएँ भी हथियार उठा सकती हैं।
  • स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी समान भागीदारी है।
  • आधुनिक भारत में महिलाओं को समान अवसर मिलने चाहिए।

यह विचार उस समय अत्यंत प्रगतिशील माना जाता था।


INA की सैनिक संख्या

इतिहासकारों के अनुसार INA की सैनिक संख्या समय-समय पर बदलती रही।

सामान्यतः माना जाता है कि—

  • लगभग 40,000 से 60,000 सैनिक INA से जुड़े।

इनमें—

  • पूर्व ब्रिटिश भारतीय सैनिक
  • दक्षिण-पूर्व एशिया के भारतीय प्रवासी
  • स्वयंसेवक

शामिल थे।


INA में धार्मिक एकता

INA भारतीय राष्ट्रीय एकता का उत्कृष्ट उदाहरण थी।

इसमें—

  • हिन्दू
  • मुस्लिम
  • सिख
  • ईसाई
  • बौद्ध

सभी धर्मों के सैनिक एक साथ सेवा करते थे।

नेताजी का स्पष्ट संदेश था—

“धर्म व्यक्ति का निजी विषय है, राष्ट्र सबसे ऊपर है।”


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य (Part 2A)

प्रश्नउत्तर
INA का पहला गठनकैप्टन मोहन सिंह (1942)
INA का पुनर्गठननेताजी (1943)
INA का आदर्श वाक्यइत्तेफाक, एतमाद, कुर्बानी
INA का राष्ट्रीय अभिवादनजय हिन्द
महिलाओं की सेनारानी झाँसी रेजिमेंट
कमांडरडॉ. लक्ष्मी सहगल
ध्वज का प्रतीकउछलता हुआ बाघ
प्रमुख ब्रिगेडगांधी, नेहरू, आज़ाद, सुभाष

आज़ाद हिन्द सरकार (Provisional Government of Free India)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 21 अक्टूबर 1943 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर में आज़ाद हिन्द सरकार (Arzi Hukumat-e-Azad Hind / Provisional Government of Free India) की स्थापना की।

यह सरकार केवल एक प्रतीकात्मक घोषणा नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि भारत केवल स्वतंत्रता की मांग नहीं कर रहा है, बल्कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वयं शासन करने के लिए भी तैयार है।

आज़ाद हिन्द सरकार ने प्रशासन, विदेश नीति, सेना, न्याय व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था की प्रारम्भिक रूपरेखा भी प्रस्तुत की।


आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना

विषयजानकारी
स्थापना21 अक्टूबर 1943
स्थानसिंगापुर
संस्थापकनेताजी सुभाष चन्द्र बोस
अंग्रेजी नामProvisional Government of Free India
उर्दू नामआरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिन्द

आज़ाद हिन्द सरकार की आवश्यकता क्यों पड़ी?

नेताजी का मानना था कि किसी भी स्वतंत्रता आंदोलन की विश्वसनीयता तभी बढ़ती है जब उसके पास—

  • अपनी सरकार हो,
  • अपनी सेना हो,
  • अपना ध्वज हो,
  • अपनी विदेश नीति हो,
  • और जनता का समर्थन हो।

इसलिए उन्होंने केवल सेना का नेतृत्व करने के बजाय एक वैकल्पिक भारतीय सरकार की स्थापना की।


नेताजी की भूमिका

आज़ाद हिन्द सरकार में नेताजी ने कई महत्वपूर्ण पद स्वयं संभाले।

वे—

  • राष्ट्राध्यक्ष (Head of State)
  • प्रधानमंत्री (Prime Minister)
  • युद्ध मंत्री (Minister for War)
  • विदेश मंत्री (Minister for Foreign Affairs)

भी थे।

यह व्यवस्था अस्थायी थी क्योंकि युद्ध की परिस्थितियों में प्रशासन को शीघ्र निर्णय लेने की आवश्यकता थी।


आज़ाद हिन्द सरकार के उद्देश्य

सरकार के प्रमुख उद्देश्य थे—

  • भारत को ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्र कराना।
  • भारतीय सीमा में प्रवेश कर राष्ट्रीय सरकार स्थापित करना।
  • स्वतंत्र भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाना।
  • भारतीय जनता को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करना।
  • विदेशी देशों से राजनयिक संबंध स्थापित करना।

आज़ाद हिन्द सरकार का राष्ट्रीय ध्वज

आज़ाद हिन्द सरकार ने तिरंगे ध्वज को अपनाया।

इस ध्वज में मध्य भाग में उछलता हुआ बाघ (Springing Tiger) अंकित था।

इसका प्रतीकात्मक अर्थ

  • शक्ति
  • साहस
  • गति
  • स्वतंत्रता के लिए संघर्ष

राष्ट्रीय अभिवादन

आज़ाद हिन्द सरकार और INA में

“जय हिन्द”

राष्ट्रीय अभिवादन के रूप में अपनाया गया।

स्वतंत्र भारत में भी यह अभिवादन अत्यंत लोकप्रिय हुआ।


राष्ट्रीय गीत

INA के सैनिकों के बीच

“कदम कदम बढ़ाए जा”

सबसे लोकप्रिय सैन्य मार्चिंग गीत था।

यह सैनिकों का उत्साह बढ़ाने वाला गीत था और आज भी भारतीय सशस्त्र बलों में सम्मान के साथ गाया जाता है।


राष्ट्रीय आदर्श

आज़ाद हिन्द सरकार ने जिन मूल्यों पर बल दिया—

  • राष्ट्रीय एकता
  • अनुशासन
  • त्याग
  • बलिदान
  • सामाजिक समानता
  • धार्मिक सद्भाव

आज़ाद हिन्द सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था

यद्यपि यह सरकार युद्धकालीन परिस्थितियों में कार्य कर रही थी, फिर भी नेताजी ने प्रशासनिक ढांचा विकसित करने का प्रयास किया।

सरकार के प्रमुख विभागों में शामिल थे—

  • रक्षा
  • विदेश
  • प्रचार
  • वित्त
  • न्याय
  • नागरिक प्रशासन

इन विभागों का उद्देश्य स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप प्रस्तुत करना था।


आज़ाद हिन्द बैंक (Azad Hind Bank)

आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आज़ाद हिन्द बैंक की स्थापना की गई।

इस बैंक का उद्देश्य था—

  • सरकार के वित्तीय कार्यों का संचालन
  • जनता से आर्थिक सहयोग प्राप्त करना
  • सैनिकों एवं प्रशासनिक कार्यों के लिए धन उपलब्ध कराना

दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों ने इस बैंक को उदारतापूर्वक आर्थिक सहयोग दिया।


मुद्रा एवं डाक टिकट

आज़ाद हिन्द सरकार ने स्वतंत्र राष्ट्र की पहचान स्थापित करने के उद्देश्य से—

  • मुद्रा (Currency) जारी करने की योजना बनाई।
  • डाक टिकट (Postage Stamps) भी तैयार किए।

यद्यपि इनका व्यापक उपयोग युद्ध की परिस्थितियों के कारण सीमित रहा, लेकिन इनका ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है।


न्याय व्यवस्था

नेताजी का उद्देश्य था कि स्वतंत्र भारत में न्याय सभी नागरिकों को समान रूप से मिले।

उन्होंने प्रशासन और सेना में अनुशासन तथा विधि के शासन (Rule of Law) पर विशेष बल दिया।


किन देशों ने आज़ाद हिन्द सरकार को मान्यता दी?

यह UPSC तथा SSC में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

आज़ाद हिन्द सरकार को उस समय कई देशों ने मान्यता प्रदान की।

प्रमुख देश थे—

  • जापान
  • जर्मनी
  • इटली
  • बर्मा (वर्तमान म्यांमार)
  • फिलीपींस
  • मंचुकुओ (Manchukuo)
  • क्रोएशिया
  • थाईलैंड (सहयोगात्मक स्तर पर)
  • नानकिंग स्थित चीन की तत्कालीन जापान-समर्थित सरकार

ध्यान दें (UPSC Fact): विभिन्न स्रोतों में मान्यता देने वाले देशों की संख्या अलग-अलग (आमतौर पर 9 से 11) बताई जाती है। परीक्षा में सबसे सुरक्षित उत्तर प्रमुख देशों के नाम लिखना है।


अंतरराष्ट्रीय महत्व

आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना का सबसे बड़ा प्रभाव यह था कि पहली बार किसी भारतीय नेतृत्व वाली सरकार को विदेशी देशों ने औपचारिक मान्यता दी।

इससे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली।


अंडमान और निकोबार द्वीप

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीपों पर अधिकार कर लिया था।

बाद में जापान ने इन द्वीपों का प्रशासन प्रतीकात्मक रूप से आज़ाद हिन्द सरकार को सौंप दिया।

यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।


नेताजी का ऐतिहासिक दौरा

दिसम्बर 1943 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अंडमान द्वीप पहुँचे।

उन्होंने वहाँ भारतीय ध्वज फहराया।

यह पहली बार था जब किसी भारतीय राष्ट्रवादी नेतृत्व ने भारतीय भूमि पर स्वतंत्र भारत के प्रतीक के रूप में ध्वज फहराया।


अंडमान और निकोबार के नए नाम

नेताजी ने इन द्वीपों के नए नाम घोषित किए—

पुराना नामनया नाम
अंडमानशहीद द्वीप
निकोबारस्वराज द्वीप

इन नामों का महत्व

शहीद

उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति का प्रतीक था जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।

स्वराज

भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की आकांक्षा का प्रतीक था।


क्या आज़ाद हिन्द सरकार पूरे भारत पर शासन करती थी?

नहीं।

यह समझना अत्यंत आवश्यक है।

आज़ाद हिन्द सरकार—

  • पूरे भारत पर वास्तविक प्रशासन नहीं चलाती थी।
  • इसे एक निर्वासित (Government-in-Exile) अथवा अस्थायी स्वतंत्र सरकार माना जाता है।
  • इसका नियंत्रण मुख्यतः जापानी प्रभाव वाले क्षेत्रों तक सीमित था।

फिर भी इसका राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव अत्यंत व्यापक था।


आज़ाद हिन्द सरकार का ऐतिहासिक महत्व

इतिहासकारों के अनुसार इस सरकार का महत्व कई कारणों से है—

  1. पहली संगठित वैकल्पिक भारतीय सरकार।
  2. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अंतरराष्ट्रीयकरण।
  3. भारतीय सेना के राष्ट्रीयकरण का प्रयास।
  4. भारतीयों में आत्मविश्वास का विकास।
  5. ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती।

परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्नउत्तर
आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना21 अक्टूबर 1943
स्थापना स्थलसिंगापुर
संस्थापकनेताजी सुभाष चन्द्र बोस
राष्ट्राध्यक्षनेताजी
प्रधानमंत्रीनेताजी
युद्ध मंत्रीनेताजी
विदेश मंत्रीनेताजी
राष्ट्रीय अभिवादनजय हिन्द
प्रसिद्ध मार्चिंग गीतकदम कदम बढ़ाए जा
अंडमान का नया नामशहीद
निकोबार का नया नामस्वराज
अंडमान यात्रादिसम्बर 1943

भारत की ओर आज़ाद हिन्द फ़ौज का सैन्य अभियान

आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना के बाद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का अगला उद्देश्य केवल राजनीतिक घोषणाएँ करना नहीं था, बल्कि भारतीय सीमा में प्रवेश करके ब्रिटिश शासन के विरुद्ध वास्तविक सैन्य अभियान प्रारम्भ करना था।

उनका विश्वास था कि यदि आज़ाद हिन्द फ़ौज भारत की सीमा में प्रवेश कर जाएगी, तो—

  • भारतीय जनता व्यापक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होगी।
  • ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सैनिक अंग्रेजों का साथ छोड़ सकते हैं।
  • पूरे देश में राष्ट्रीय विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

इसी लक्ष्य के साथ 1944 में INA और जापानी सेना ने संयुक्त सैन्य अभियान प्रारम्भ किया।


“दिल्ली चलो” अभियान

नेताजी ने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा—

“हमारा लक्ष्य दिल्ली है।”

इसी कारण इस अभियान को लोकप्रिय रूप से “दिल्ली चलो अभियान” कहा गया।

यह केवल एक नारा नहीं था बल्कि पूरे सैन्य अभियान की रणनीतिक दिशा थी।

इस अभियान का उद्देश्य था—

  • बर्मा (म्यांमार) से भारत में प्रवेश करना।
  • पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश सेना को पराजित करना।
  • भारतीय जनता को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित करना।
  • अंततः दिल्ली पहुँचकर स्वतंत्र भारत की सरकार स्थापित करना।
subhash chandra bos upsc notes

भारत की सीमा की ओर प्रस्थान

1944 के प्रारम्भ में INA और जापानी सेना ने बर्मा से भारत की ओर बढ़ना शुरू किया।

मुख्य मार्ग था—

बर्मा → मणिपुर → असम → भारत के अन्य भाग

उस समय यह क्षेत्र अत्यंत दुर्गम था।

मुख्य कठिनाइयाँ थीं—

  • घने जंगल
  • ऊँचे पर्वत
  • अत्यधिक वर्षा
  • सीमित सड़कें
  • रसद की कमी

इसके बावजूद INA के सैनिक अत्यंत उत्साह के साथ आगे बढ़े।


मोइरांग (Moirang) का ऐतिहासिक महत्व

INA की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मोइरांग (जिला बिष्णुपुर, मणिपुर) पर अधिकार स्थापित करना था।

मोइरांग क्यों महत्वपूर्ण है?

14 अप्रैल 1944 को INA के अधिकारियों ने मोइरांग में स्वतंत्र भारत का ध्वज फहराया।

यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।

कई इतिहासकार इसे भारतीय भूमि पर आज़ाद हिन्द सरकार के ध्वज के प्रथम औपचारिक आरोहण के रूप में उल्लेखित करते हैं।


मोइरांग में ध्वज फहराने का महत्व

इस घटना ने यह संदेश दिया कि—

  • भारत की सीमा में INA प्रवेश कर चुकी है।
  • स्वतंत्रता का संघर्ष अब केवल विदेशों तक सीमित नहीं रहा।
  • भारतीय सैनिक भारत की धरती पर स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं।

आज मणिपुर के मोइरांग में INA स्मारक (INA Memorial Complex) स्थित है।


इम्फाल अभियान (Battle of Imphal)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और द्वितीय विश्व युद्ध दोनों की दृष्टि से इम्फाल का युद्ध अत्यंत महत्वपूर्ण था।

समय

मार्च 1944 – जुलाई 1944

स्थान

इम्फाल (मणिपुर)

पक्ष

  • जापानी सेना + INA
  • ब्रिटिश एवं मित्र राष्ट्रों की सेना

इम्फाल अभियान का उद्देश्य

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य था—

  • इम्फाल पर अधिकार करना।
  • ब्रिटिश सेना की आपूर्ति व्यवस्था को समाप्त करना।
  • असम की ओर बढ़ना।
  • भारत के भीतर राष्ट्रीय विद्रोह को प्रेरित करना।

यदि इम्फाल पर नियंत्रण स्थापित हो जाता, तो आगे का मार्ग अपेक्षाकृत आसान हो सकता था।


प्रारम्भिक सफलता

अभियान के प्रारम्भिक चरण में INA और जापानी सेना को कुछ महत्वपूर्ण सफलताएँ मिलीं।

उन्होंने—

  • अनेक चौकियों पर कब्ज़ा किया।
  • ब्रिटिश सेना को पीछे हटने के लिए विवश किया।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में दबाव बनाया।

इस समय INA के सैनिकों का मनोबल अत्यंत ऊँचा था।


कोहिमा का युद्ध (Battle of Kohima)

इम्फाल अभियान के साथ-साथ नागालैंड के कोहिमा में भी भीषण युद्ध हुआ।

समय

अप्रैल 1944 – जून 1944

स्थान

कोहिमा (वर्तमान नागालैंड)


कोहिमा का सामरिक महत्व

कोहिमा भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था।

यदि INA और जापानी सेना कोहिमा पर अधिकार कर लेते, तो—

  • असम का मार्ग खुल जाता।
  • ब्रिटिश सेना की आपूर्ति बाधित हो जाती।
  • पूरे पूर्वोत्तर भारत में उनका प्रभाव बढ़ सकता था।

इसी कारण ब्रिटिश सेना ने कोहिमा की रक्षा के लिए पूरी शक्ति लगा दी।


इम्फाल और कोहिमा के युद्ध इतने महत्वपूर्ण क्यों माने जाते हैं?

सैन्य इतिहासकार इन दोनों युद्धों को द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे कठिन लड़ाइयों में शामिल करते हैं।

ब्रिटिश सैन्य इतिहास में कोहिमा और इम्फाल को अक्सर—

“The Turning Point of the Burma Campaign”

कहा जाता है।

कुछ सैन्य इतिहासकारों ने कोहिमा के युद्ध को ब्रिटेन की सबसे महान लड़ाइयों में भी शामिल किया है।


अभियान की प्रमुख कठिनाइयाँ

यद्यपि INA के सैनिक अत्यंत साहसी थे, लेकिन उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

1. रसद (Supply) की कमी

  • भोजन की कमी
  • गोला-बारूद की कमी
  • दवाइयों का अभाव

2. मानसून

1944 में भारी वर्षा के कारण—

  • सड़कें नष्ट हो गईं।
  • वाहन आगे नहीं बढ़ सके।
  • सैनिकों की गति धीमी हो गई।

3. बीमारी

जंगलों में सैनिकों को—

  • मलेरिया
  • पेचिश
  • हैजा
  • कुपोषण

जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।


4. वायु शक्ति की कमी

ब्रिटिश सेना को मित्र राष्ट्रों (विशेषकर ब्रिटिश और अमेरिकी वायुसेना) का मजबूत हवाई समर्थन प्राप्त था।

दूसरी ओर INA के पास पर्याप्त वायु समर्थन नहीं था।

इससे ब्रिटिश सेना को रसद, हथियार और सैनिकों की आपूर्ति लगातार मिलती रही।


5. जापान की स्थिति

INA जापानी सेना के साथ मिलकर युद्ध कर रही थी।

जैसे-जैसे जापान की स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध में कमजोर होती गई, वैसे-वैसे INA की सैन्य क्षमता भी प्रभावित हुई।


अभियान की विफलता

अंततः—

  • इम्फाल पर कब्ज़ा नहीं हो सका।
  • कोहिमा भी ब्रिटिश सेना के नियंत्रण में रहा।
  • जापानी सेना पीछे हटने लगी।
  • INA को भी पीछे हटना पड़ा।

यह सैन्य दृष्टि से एक बड़ी असफलता थी।


क्या INA की हार केवल सैन्य कारणों से हुई?

नहीं।

इतिहासकारों के अनुसार कई कारण जिम्मेदार थे—

  • सीमित संसाधन
  • आधुनिक हथियारों की कमी
  • हवाई समर्थन का अभाव
  • कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ
  • जापान की पराजय
  • लंबी आपूर्ति लाइनें

इन परिस्थितियों में विजय प्राप्त करना अत्यंत कठिन था।


जापान का आत्मसमर्पण

1945 में युद्ध की दिशा पूरी तरह बदल गई।

  • मई 1945 में जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया।
  • अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए।
  • 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

जापान की हार के साथ ही INA का सैन्य अभियान भी समाप्त हो गया।


INA के सैनिकों का भविष्य

युद्ध समाप्त होने के बाद—

  • अनेक INA सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • उन्हें भारत लाया गया।
  • कई अधिकारियों पर मुकदमे चलाए गए।
  • अनेक सैनिकों को कैदी बनाया गया।

यहीं से प्रारम्भ होता है भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अगला महत्वपूर्ण अध्याय—

लाल किला मुकदमा (INA Trials)


क्या INA असफल रही?

यदि केवल सैन्य दृष्टि से देखा जाए तो INA अपना अंतिम लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकी।

लेकिन राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक था।

INA ने—

  • भारतीयों में राष्ट्रीय आत्मविश्वास जगाया।
  • ब्रिटिश भारतीय सेना की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाया।
  • ब्रिटिश शासन को यह एहसास कराया कि भारतीय सैनिक हमेशा उनके प्रति वफादार नहीं रहेंगे।
  • स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।

इसी कारण अनेक इतिहासकार मानते हैं कि INA का प्रभाव उसके सैन्य परिणामों से कहीं अधिक व्यापक था।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्नउत्तर
दिल्ली चलो अभियान का उद्देश्यभारत में प्रवेश कर स्वतंत्रता संग्राम को तेज करना
मोइरांग में ध्वज कब फहराया गया?14 अप्रैल 1944
मोइरांग किस राज्य में है?मणिपुर
इम्फाल अभियान1944
कोहिमा का युद्ध1944
प्रमुख सहयोगीजापानी सेना
अभियान की सबसे बड़ी समस्यारसद और हवाई समर्थन की कमी
जापान ने आत्मसमर्पण कब किया?15 अगस्त 1945

लाल किला मुकदमा (INA Trials) एवं भारतीय स्वतंत्रता पर आज़ाद हिन्द फ़ौज का प्रभाव | UPSC, SSC, PSC Complete Notes

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA) के मुकदमे, जिन्हें सामान्यतः लाल किला मुकदमा (Red Fort Trials) कहा जाता है, एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुए। यद्यपि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के कारण INA का सैन्य अभियान समाप्त हो गया था, लेकिन इसके बाद जो घटनाएँ हुईं, उन्होंने ब्रिटिश शासन की नींव को गंभीर रूप से हिला दिया।

अनेक इतिहासकारों का मत है कि यदि INA के सैनिकों पर मुकदमे न चलते, तो भारतीय जनता और ब्रिटिश भारतीय सेना में वैसा व्यापक असंतोष उत्पन्न नहीं होता, जिसने अंततः अंग्रेजों को भारत छोड़ने का निर्णय लेने पर विवश किया।


जापान की हार के बाद INA की स्थिति

15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

इसके बाद—

  • INA के अधिकांश सैनिकों ने हथियार डाल दिए।
  • अनेक अधिकारियों को मित्र राष्ट्रों ने गिरफ्तार कर लिया।
  • हजारों सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया।
  • नेताजी सुभाष चन्द्र बोस दक्षिण-पूर्व एशिया से निकलने का प्रयास कर रहे थे।

ब्रिटिश सरकार ने निर्णय लिया कि INA के अधिकारियों पर भारत में राजद्रोह (Treason) का मुकदमा चलाया जाएगा।


मुकदमा कहाँ चलाया गया?

ब्रिटिश सरकार ने मुकदमे के लिए दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले (Red Fort) को चुना।

इसका उद्देश्य था—

  • INA को देशद्रोही सिद्ध करना।
  • भारतीय जनता को यह संदेश देना कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को कठोर दंड मिलेगा।

लेकिन परिणाम इसके बिल्कुल विपरीत निकला।

पूरा देश INA के समर्थन में खड़ा हो गया।


पहला लाल किला मुकदमा (नवंबर 1945)

पहला मुकदमा नवंबर 1945 में प्रारम्भ हुआ।

इसमें INA के तीन प्रमुख अधिकारियों को अभियुक्त बनाया गया।


तीन प्रमुख अभियुक्त

1. कर्नल शाहनवाज़ ख़ान

  • पूर्व अधिकारी, ब्रिटिश भारतीय सेना
  • बाद में INA में शामिल हुए
  • मुकदमे के प्रमुख अभियुक्तों में से एक

2. कर्नल प्रेम कुमार सहगल

  • ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी
  • जापान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए
  • बाद में INA में सम्मिलित हुए

3. लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों

  • ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी
  • बाद में INA के महत्वपूर्ण सैन्य अधिकारी बने

तीन अधिकारियों का चयन क्यों महत्वपूर्ण था?

ब्रिटिश सरकार ने संभवतः यह सोचकर इन तीन अधिकारियों का चयन किया कि मुकदमे से INA की छवि खराब होगी।

लेकिन इन तीनों अधिकारियों का संबंध तीन प्रमुख धर्मों से था—

अधिकारीधर्म
शाहनवाज़ ख़ानमुस्लिम
प्रेम सहगलहिन्दू
गुरबख्श सिंह ढिल्लोंसिख

इससे पूरे भारत में राष्ट्रीय एकता का अद्भुत संदेश गया।

जनता ने इसे हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता का प्रतीक माना।


लगाए गए आरोप

ब्रिटिश सरकार ने INA अधिकारियों पर कई आरोप लगाए—

  • ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ना।
  • राजद्रोह।
  • हत्या एवं हत्या के लिए उकसाना (कुछ मामलों में)।
  • सैन्य अनुशासन का उल्लंघन।

ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि ये अधिकारी ब्रिटिश भारतीय सेना के सदस्य थे, इसलिए उनका INA में शामिल होना देशद्रोह था।


बचाव पक्ष (Defence Team)

INA अधिकारियों की ओर से भारत के प्रसिद्ध वकीलों ने पैरवी की।

सबसे प्रमुख नाम थे—

  • भूलाभाई देसाई (मुख्य अधिवक्ता)
  • के. एन. काटजू
  • आसफ अली
  • जवाहरलाल नेहरू (उन्होंने वर्षों बाद पुनः वकालत का चोगा पहनकर बचाव पक्ष में भाग लिया)

यह मुकदमा केवल कानूनी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न बन गया था।


भूलाभाई देसाई की ऐतिहासिक दलील

भूलाभाई देसाई ने न्यायालय में तर्क दिया कि—

यदि कोई व्यक्ति अपने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करता है, तो उसे देशद्रोही नहीं कहा जा सकता।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून, प्राकृतिक न्याय और राष्ट्रीय आत्मनिर्णय (Right of Self-Determination) के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए INA अधिकारियों का पक्ष रखा।

उनकी दलीलों को भारतीय न्यायिक इतिहास की सर्वश्रेष्ठ बहसों में गिना जाता है।


पूरे देश में जनआंदोलन

INA मुकदमे के दौरान पूरे भारत में अभूतपूर्व जनसमर्थन देखने को मिला।

देश के लगभग सभी प्रमुख नगरों में—

  • रैलियाँ निकाली गईं।
  • हड़तालें हुईं।
  • छात्र आंदोलनों का आयोजन हुआ।
  • धन संग्रह किया गया।
  • वकीलों और सामाजिक संगठनों ने खुलकर समर्थन दिया।

यह आंदोलन किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं था।


कांग्रेस की भूमिका

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने INA अधिकारियों के समर्थन का निर्णय लिया।

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल सहित अनेक नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि INA सैनिकों की देशभक्ति पर संदेह नहीं किया जा सकता।

यद्यपि कांग्रेस और नेताजी की रणनीतियों में पहले मतभेद रहे थे, लेकिन INA मुकदमे के समय लगभग पूरा राष्ट्रीय नेतृत्व एकजुट दिखाई दिया।


मुस्लिम लीग की भूमिका

मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने भी INA अधिकारियों के समर्थन में अपनी सहानुभूति व्यक्त की।

इस प्रकार INA मुकदमा उन विरले अवसरों में से था जब विभिन्न राजनीतिक दल एक समान राष्ट्रीय भावना के साथ दिखाई दिए।


जनता की प्रतिक्रिया

जनता का मानना था कि—

“जो लोग भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़े हैं, वे देशद्रोही नहीं बल्कि राष्ट्रभक्त हैं।”

INA सैनिक राष्ट्रीय नायक बन गए।

उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि ब्रिटिश सरकार के लिए कठोर दंड देना राजनीतिक रूप से कठिन हो गया।


न्यायालय का निर्णय

दिसंबर 1945 में न्यायालय ने तीनों अधिकारियों को दोषी ठहराया।

उन्हें विभिन्न प्रकार के दंड दिए गए।

लेकिन जनता के तीव्र विरोध और देशव्यापी आंदोलन के कारण ब्रिटिश सरकार ने अंततः उनकी सजा को लागू नहीं किया।

तीनों अधिकारियों को रिहा कर दिया गया।


INA Trials का ऐतिहासिक महत्व

इतिहासकार मानते हैं कि इन मुकदमों का प्रभाव केवल अदालत तक सीमित नहीं था।

इनसे—

  • राष्ट्रीय एकता मजबूत हुई।
  • ब्रिटिश शासन की नैतिक स्थिति कमजोर हुई।
  • भारतीय सेना में असंतोष बढ़ा।
  • स्वतंत्रता आंदोलन को नई गति मिली।

1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (Royal Indian Navy Mutiny)

फरवरी 1946 में ब्रिटिश भारतीय नौसेना (Royal Indian Navy) के नाविकों ने विद्रोह कर दिया।

यह घटना मुंबई (तत्कालीन बंबई) से प्रारम्भ हुई और शीघ्र ही अनेक नौसैनिक अड्डों तक फैल गई।


विद्रोह के कारण

  • खराब भोजन
  • नस्लीय भेदभाव
  • कम वेतन
  • ब्रिटिश अधिकारियों का अपमानजनक व्यवहार
  • INA सैनिकों के प्रति सहानुभूति
  • राष्ट्रीय भावना का उभार

विद्रोह का विस्तार

विद्रोह शीघ्र ही फैल गया—

  • बंबई
  • कराची
  • मद्रास
  • विशाखापट्टनम
  • कोच्चि
  • कलकत्ता

आदि कई स्थानों पर इसका प्रभाव देखा गया।

लगभग 78 जहाज़, 20 तटीय प्रतिष्ठान और 20,000 से अधिक नाविक इस आंदोलन से जुड़े।


क्या INA का प्रभाव नौसेना विद्रोह पर पड़ा?

अनेक इतिहासकारों का उत्तर है—हाँ।

INA मुकदमे के बाद भारतीय सैनिकों और नाविकों में राष्ट्रीय भावना अत्यधिक प्रबल हो गई थी।

वे यह महसूस करने लगे थे कि वे केवल ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपने देश के लिए भी उत्तरदायी हैं।


ब्रिटिश सरकार की चिंता

ब्रिटिश सरकार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था—

यदि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की निष्ठा समाप्त हो जाए, तो भारत पर शासन कैसे किया जाएगा?

यही प्रश्न आगे चलकर ब्रिटेन की नीति में निर्णायक सिद्ध हुआ।


इतिहासकारों की राय

इस विषय पर इतिहासकारों के मत अलग-अलग हैं।

मत 1

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि भारत की स्वतंत्रता मुख्यतः—

  • गांधीजी के जनआंदोलनों,
  • कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति,
  • द्वितीय विश्व युद्ध के आर्थिक प्रभाव

का परिणाम थी।

मत 2

दूसरे इतिहासकारों का मत है कि—

  • INA,
  • लाल किला मुकदमे,
  • रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह,
  • तथा भारतीय सशस्त्र बलों में बढ़ते असंतोष

ने ब्रिटिश सरकार को यह एहसास करा दिया कि अब भारत पर सैन्य बल के आधार पर शासन करना संभव नहीं रहेगा।

संतुलित निष्कर्ष (UPSC के लिए)

UPSC उत्तर लेखन में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

भारत की स्वतंत्रता किसी एक कारण से नहीं मिली, बल्कि अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव से मिली—

  • गांधीजी के जनआंदोलन,
  • क्रांतिकारी गतिविधियाँ,
  • INA का प्रभाव,
  • नौसेना विद्रोह,
  • द्वितीय विश्व युद्ध,
  • ब्रिटेन की आर्थिक कमजोरी,
  • अंतरराष्ट्रीय दबाव,
  • भारतीय जनता की राष्ट्रीय चेतना।

परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्नउत्तर
पहला INA मुकदमा कब प्रारम्भ हुआ?नवंबर 1945
मुकदमा कहाँ चला?लाल किला, दिल्ली
मुख्य अभियुक्तशाहनवाज़ ख़ान, प्रेम सहगल, गुरबख्श सिंह ढिल्लों
मुख्य बचाव पक्ष के वकीलभूलाभाई देसाई
अन्य प्रमुख वकीलके. एन. काटजू, आसफ अली, जवाहरलाल नेहरू
नौसेना विद्रोह कब हुआ?फरवरी 1946
नौसेना विद्रोह कहाँ से शुरू हुआ?बंबई (मुंबई)
नौसेना विद्रोह में लगभग कितने नाविक शामिल हुए?20,000+
UPSC के लिए निष्कर्षस्वतंत्रता अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु, जाँच आयोग एवं ऐतिहासिक विरासत | Complete Notes (UPSC, SSC, PSC)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु सबसे विवादास्पद विषयों में से एक है। 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (वर्तमान ताइपेई, ताइवान) में कथित विमान दुर्घटना के बाद उनकी मृत्यु होने का दावा किया गया, लेकिन इस घटना को लेकर दशकों तक विभिन्न मत और विवाद बने रहे।

इस विषय पर भारत सरकार ने समय-समय पर कई जाँच समितियाँ और आयोग गठित किए। आज भी यह विषय इतिहासकारों, शोधकर्ताओं तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

UPSC Tip: इस विषय में तथ्यों को संतुलित ढंग से लिखना चाहिए। किसी अप्रमाणित सिद्धांत को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।


द्वितीय विश्व युद्ध का अंतिम चरण

1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्र (Axis Powers) लगातार पराजित हो रहे थे।

मुख्य घटनाएँ—

  • 30 अप्रैल 1945 – एडोल्फ हिटलर की मृत्यु।
  • 8 मई 1945 – जर्मनी का आत्मसमर्पण (VE Day)।
  • 6 अगस्त 1945 – हिरोशिमा पर परमाणु बम।
  • 9 अगस्त 1945 – नागासाकी पर परमाणु बम।
  • 15 अगस्त 1945 – जापान का आत्मसमर्पण।

जापान की हार के साथ ही आज़ाद हिन्द फ़ौज का सैन्य आधार समाप्त हो गया।


नेताजी की अंतिम यात्रा

जापान के आत्मसमर्पण के बाद नेताजी ने दक्षिण-पूर्व एशिया से निकलकर आगे की रणनीति बनाने का निर्णय लिया।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार वे—

  • सिंगापुर
  • बैंकॉक
  • सैगॉन (वर्तमान हो ची मिन्ह सिटी, वियतनाम)

से होते हुए जापानी विमान द्वारा आगे की यात्रा पर निकले।

उनका अंतिम गंतव्य क्या था, इस पर विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में मतभेद मिलता है। अधिकांश विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार उनका उद्देश्य मंचूरिया (Manchuria) के मार्ग से सोवियत संघ तक पहुँचना था।


ताइहोकू (Taihoku) विमान दुर्घटना

तिथि

18 अगस्त 1945

स्थान

ताइहोकू हवाई अड्डा (Taihoku Airfield)
वर्तमान नाम — ताइपेई (Taipei), ताइवान

जापानी अधिकारियों के अनुसार विमान उड़ान भरने के तुरंत बाद तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया।


दुर्घटना के बाद क्या हुआ?

जापानी प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार—

  • विमान में आग लग गई।
  • नेताजी गंभीर रूप से झुलस गए।
  • उन्हें ताइहोकू के सैन्य अस्पताल ले जाया गया।
  • कुछ घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई।

उनका उपचार जापानी सैन्य चिकित्सकों द्वारा किया गया था।


अस्थियों का संरक्षण

जापानी अभिलेखों के अनुसार नेताजी का अंतिम संस्कार ताइहोकू में किया गया।

बाद में उनकी अस्थियाँ जापान ले जाकर टोक्यो स्थित रेनकोजी (Renkoji) मंदिर में सुरक्षित रखी गईं।

आज भी यह मंदिर नेताजी से जुड़े ऐतिहासिक महत्व का केंद्र माना जाता है।


मृत्यु पर विवाद क्यों हुआ?

नेताजी की मृत्यु के संबंध में कई कारणों से विवाद उत्पन्न हुआ—

  • उनके पार्थिव शरीर को भारत नहीं लाया गया।
  • दुर्घटना के प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित थे।
  • विभिन्न व्यक्तियों ने अलग-अलग दावे किए।
  • स्वतंत्रता के बाद भी अनेक लोगों का विश्वास था कि नेताजी जीवित हैं।

इसी कारण सरकार को कई बार जाँच करानी पड़ी।


शाहनवाज़ समिति (1956)

स्वतंत्र भारत में नेताजी की मृत्यु की जाँच के लिए पहली आधिकारिक समिति 1956 में गठित की गई।

अध्यक्ष

शाहनवाज़ ख़ान

(पूर्व INA अधिकारी एवं बाद में सांसद)

अन्य सदस्य

  • एस. एन. मैत्रा
  • सुरेश चन्द्र बोस (नेताजी के बड़े भाई)

समिति का निष्कर्ष

बहुमत की रिपोर्ट में कहा गया—

  • 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना हुई।
  • उसी दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हुई।

महत्वपूर्ण तथ्य

सुरेश चन्द्र बोस ने इस निष्कर्ष से असहमति व्यक्त की और अलग रिपोर्ट प्रस्तुत की।


खोसला आयोग (1970)

विवाद जारी रहने के कारण भारत सरकार ने 1970 में एक न्यायिक आयोग गठित किया।

अध्यक्ष

न्यायमूर्ति जी. डी. खोसला


आयोग का निष्कर्ष

आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष दिया कि—

नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 की विमान दुर्घटना में हुई थी।


मुखर्जी आयोग (1999–2005)

1999 में भारत सरकार ने एक नया आयोग गठित किया।

अध्यक्ष

न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी

यह अब तक की सबसे विस्तृत आधिकारिक जाँचों में से एक थी।

आयोग ने भारत, जापान, ताइवान तथा अन्य देशों से उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन किया।


मुखर्जी आयोग का निष्कर्ष

आयोग ने अपनी रिपोर्ट (2005) में कहा—

  • उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विमान दुर्घटना में मृत्यु सिद्ध नहीं होती।
  • रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को नेताजी की अस्थियाँ सिद्ध करने हेतु पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया

भारत सरकार ने 2006 में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट स्वीकार नहीं की।

इस प्रकार सरकारी स्तर पर कोई नया आधिकारिक निष्कर्ष स्थापित नहीं किया गया।


नेताजी से जुड़ी गोपनीय फाइलें

कई दशकों तक नेताजी से संबंधित अनेक सरकारी दस्तावेज गोपनीय रहे।

बाद के वर्षों में भारत सरकार तथा पश्चिम बंगाल सरकार ने कई फाइलों को सार्वजनिक किया।

इन दस्तावेज़ों से शोधकर्ताओं को नई जानकारी मिली, लेकिन नेताजी की मृत्यु के संबंध में कोई सर्वमान्य नया निष्कर्ष स्थापित नहीं हो सका।


इतिहासकारों का संतुलित दृष्टिकोण

आज अधिकांश मुख्यधारा के इतिहासकार उपलब्ध दस्तावेजों, जापानी अभिलेखों और प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर विमान दुर्घटना सिद्धांत को सबसे अधिक समर्थित मानते हैं।

हालाँकि, कुछ शोधकर्ता वैकल्पिक सिद्धांतों का समर्थन करते हैं।

UPSC एवं SSC परीक्षाओं में किसी अप्रमाणित सिद्धांत को तथ्य के रूप में नहीं लिखना चाहिए।


नेताजी का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

नेताजी का योगदान केवल INA तक सीमित नहीं था।

उन्होंने—

  • भारतीय युवाओं में राष्ट्रवाद की भावना जगाई।
  • स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार स्थापित की।
  • विदेशों में भारत की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया।
  • महिलाओं को सैन्य नेतृत्व में स्थान दिया।
  • भारतीय सैनिकों को राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ा।
  • राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता पर बल दिया।

नेताजी के प्रमुख विचार

उनके राजनीतिक एवं राष्ट्रीय विचारों के प्रमुख आधार थे—

  • पूर्ण स्वतंत्रता
  • राष्ट्रवाद
  • अनुशासन
  • सामाजिक न्याय
  • वैज्ञानिक विकास
  • औद्योगिकीकरण
  • योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था
  • मजबूत राष्ट्रीय रक्षा
  • धार्मिक सद्भाव

नेताजी के प्रसिद्ध नारे

  • जय हिन्द
  • दिल्ली चलो
  • तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा
  • इत्तेफाक, एतमाद, कुर्बानी

नेताजी से जुड़े प्रमुख स्थान

स्थानमहत्व
कटकजन्मस्थान
कोलकाताशिक्षा एवं राजनीतिक जीवन की शुरुआत
एल्गिन रोड (नेताजी भवन)महान पलायन का स्थान
गोमो (झारखंड)महान पलायन के दौरान रेलवे स्टेशन
सिंगापुरआज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना
मोइरांग (मणिपुर)INA द्वारा ध्वजारोहण
लाल किला (दिल्ली)INA मुकदमे
रेनकोजी मंदिर (टोक्यो)कथित अस्थियों का संरक्षण

सम्पूर्ण Timeline (1897–1945)

वर्षघटना
1897कटक में जन्म
1919ICS परीक्षा उत्तीर्ण
1921ICS से त्यागपत्र
1921कांग्रेस में प्रवेश
1924मांडले जेल भेजे गए
1928कलकत्ता अधिवेशन
1938हरिपुरा कांग्रेस अध्यक्ष
1939त्रिपुरी अधिवेशन, पुनः अध्यक्ष
1939फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
1940गिरफ्तारी एवं नजरबंदी
1941महान पलायन
1941जर्मनी पहुँचे
1943जापान पहुँचे
21 अक्टूबर 1943आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना
1944मोइरांग में ध्वजारोहण
1944इम्फाल एवं कोहिमा अभियान
18 अगस्त 1945ताइहोकू विमान दुर्घटना (कथित मृत्यु)

UPSC Mains के लिए निष्कर्ष

सुभाष चन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान नेताओं में थे जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य—तीनों स्तरों पर संघर्ष किया। उनकी रणनीति महात्मा गांधी से भिन्न थी, लेकिन दोनों का अंतिम लक्ष्य भारत की पूर्ण स्वतंत्रता था।

आज़ाद हिन्द फ़ौज, आज़ाद हिन्द सरकार, लाल किला मुकदमे और भारतीय सशस्त्र बलों में राष्ट्रीय चेतना के प्रसार ने ब्रिटिश शासन की वैधता को गंभीर चुनौती दी। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास लिखते समय नेताजी के योगदान को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखा जाता है।


परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्नउत्तर
कथित विमान दुर्घटना18 अगस्त 1945
स्थानताइहोकू (वर्तमान ताइपेई, ताइवान)
पहली जाँच समितिशाहनवाज़ समिति (1956)
दूसरी जाँचखोसला आयोग (1970)
तीसरी जाँचमुखर्जी आयोग (1999–2005)
आज़ाद हिन्द सरकार21 अक्टूबर 1943
INA मुकदमालाल किला, 1945
महान पलायन16–17 जनवरी 1941
फॉरवर्ड ब्लॉक3 मई 1939

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस संबंधित अभ्यास प्रश्न

Exam Focus: UPSC Prelims, SSC CGL, CHSL, CPO, State PSC, Railway, Banking, NDA, CDS, CAPF


जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन

1. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था।

2. उनका जन्म कटक (उड़ीसा) में हुआ था।

3. उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस था।

4. उनकी माता का नाम प्रभावती देवी था।

5. उनके पिता प्रसिद्ध वकील थे।

6. नेताजी कुल 14 भाई-बहनों में से एक थे।

7. उनके बड़े भाई शरत चन्द्र बोस प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे।

8. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कटक में हुई।

9. उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्ययन किया।

10. बाद में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से स्नातक किया।


ICS एवं इंग्लैंड

11. सुभाष चन्द्र बोस 1919 में इंग्लैंड गए।

12. उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।

13. उन्होंने ICS परीक्षा 1920 में उत्तीर्ण की।

14. उनकी अखिल भारतीय रैंक चौथी (4th) थी।

15. उन्होंने ब्रिटिश प्रशासनिक सेवा में कार्य नहीं किया।

16. उन्होंने 1921 में ICS से त्यागपत्र दिया।

17. त्यागपत्र का कारण भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्य करना था।


राजनीतिक जीवन

18. उनके राजनीतिक गुरु चित्तरंजन दास थे।

19. उन्होंने 1921 में कांग्रेस में प्रवेश किया।

20. वे कलकत्ता नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने।

21. 1924 में उन्हें गिरफ्तार किया गया।

22. उन्हें मांडले जेल (बर्मा) भेजा गया।

23. उन्होंने कई बार कारावास झेला।

24. वे कांग्रेस के युवा नेताओं में प्रमुख थे।

25. वे पूर्ण स्वतंत्रता के समर्थक थे।


कांग्रेस अध्यक्ष

26. 1938 में वे हरिपुरा अधिवेशन के अध्यक्ष बने।

27. हरिपुरा अधिवेशन गुजरात में हुआ था।

28. उन्होंने राष्ट्रीय योजना समिति के गठन का प्रस्ताव रखा।

29. राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बने।

30. 1939 में वे पुनः कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए।

31. त्रिपुरी अधिवेशन 1939 में हुआ।

32. उन्होंने डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को हराया।

33. गांधीजी ने कहा—”पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है।”

34. 29 अप्रैल 1939 को उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया।


फॉरवर्ड ब्लॉक

35. फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना 3 मई 1939 को हुई।

36. इसका संस्थापक सुभाष चन्द्र बोस थे।

37. इसका उद्देश्य राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित करना था।


महान पलायन

38. नेताजी नजरबंदी से जनवरी 1941 में भागे।

39. वे एल्गिन रोड स्थित अपने घर से निकले।

40. उन्होंने “मोहम्मद ज़ियाउद्दीन” नाम का उपयोग किया।

41. शिशिर कुमार बोस उन्हें कार से गोमो तक ले गए।

42. उन्होंने कालका मेल से आगे की यात्रा की।

43. वे पेशावर पहुँचे।

44. वहाँ से अफ़ग़ानिस्तान गए।

45. काबुल से जर्मनी पहुँचे।


जर्मनी

46. जर्मनी में उन्होंने Free India Centre की स्थापना की।

47. उन्होंने Azad Hind Radio प्रारम्भ किया।

48. उन्होंने भारतीय युद्धबंदियों को संगठित किया।

49. Indian Legion का गठन किया गया।

50. 1942 में उन्होंने हिटलर से मुलाकात की।


जापान यात्रा

51. 1943 में वे जर्मन पनडुब्बी U-180 से निकले।

52. समुद्र में जापानी पनडुब्बी I-29 में स्थानांतरित हुए।

53. यह विश्व इतिहास की दुर्लभ पनडुब्बी यात्राओं में से एक है।


INA

54. INA का पहला गठन 1942 में हुआ।

55. इसके संस्थापक कैप्टन मोहन सिंह थे।

56. INA का पुनर्गठन नेताजी ने किया।

57. रास बिहारी बोस ने नेतृत्व नेताजी को सौंपा।

58. INA का आदर्श वाक्य—इत्तेफाक, एतमाद, कुर्बानी।

59. INA का अभिवादन—जय हिन्द।

60. INA का युद्धघोष—दिल्ली चलो।

61. INA का ध्वज उछलते हुए बाघ वाला था।

62. गांधी ब्रिगेड INA की प्रमुख ब्रिगेड थी।

63. नेहरू ब्रिगेड भी INA का हिस्सा थी।

64. आज़ाद ब्रिगेड भी गठित की गई।

65. सुभाष ब्रिगेड सबसे महत्वपूर्ण युद्धक ब्रिगेडों में थी।


रानी झाँसी रेजिमेंट

66. इसकी स्थापना 1943 में हुई।

67. इसकी कमांडर डॉ. लक्ष्मी सहगल थीं।

68. यह महिलाओं की सैन्य रेजिमेंट थी।

69. इसका नाम रानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में रखा गया।


आज़ाद हिन्द सरकार

70. इसकी स्थापना 21 अक्टूबर 1943 को हुई।

71. स्थापना स्थल सिंगापुर था।

72. नेताजी इसके राष्ट्राध्यक्ष थे।

73. वे प्रधानमंत्री भी थे।

74. वे युद्ध मंत्री भी थे।

75. वे विदेश मंत्री भी थे।

76. इसका अभिवादन जय हिन्द था।


अंडमान-निकोबार

77. नेताजी ने दिसम्बर 1943 में अंडमान का दौरा किया।

78. अंडमान का नाम शहीद द्वीप रखा।

79. निकोबार का नाम स्वराज द्वीप रखा।


सैन्य अभियान

80. 1944 में INA भारत की सीमा में पहुँची।

81. मोइरांग मणिपुर में स्थित है।

82. 14 अप्रैल 1944 को मोइरांग में ध्वज फहराया गया।

83. इम्फाल अभियान 1944 में हुआ।

84. कोहिमा का युद्ध 1944 में हुआ।

85. अभियान में जापान ने INA का साथ दिया।


INA Trials

86. पहला INA मुकदमा नवंबर 1945 में शुरू हुआ।

87. मुकदमा लाल किले में चला।

88. शाहनवाज़ ख़ान प्रमुख अभियुक्त थे।

89. प्रेम सहगल भी अभियुक्त थे।

90. गुरबख्श सिंह ढिल्लों भी अभियुक्त थे।

91. भूलाभाई देसाई मुख्य वकील थे।

92. जवाहरलाल नेहरू भी बचाव पक्ष में शामिल हुए।


अंतिम घटनाएँ

93. जापान ने 15 अगस्त 1945 को आत्मसमर्पण किया।

94. कथित विमान दुर्घटना 18 अगस्त 1945 को हुई।

95. दुर्घटना ताइहोकू (ताइपेई) में हुई।

96. शाहनवाज़ समिति 1956 में बनी।

97. खोसला आयोग 1970 में गठित हुआ।

98. मुखर्जी आयोग 1999 में गठित हुआ।

99. “जय हिन्द” नेताजी का सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय अभिवादन बना।

100. नेताजी का जीवन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में साहस, संगठन, त्याग और राष्ट्रवाद का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है।


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