नदी प्रणाली (Drainage System):
अच्छी तरह से परिभाषित चैनलों के माध्यम से पानी के प्रवाह को ड्रेनेज कहा जाता है तथा ऐसे चैनलों के नेटवर्क को ड्रेनेज सिस्टम या नदी प्रणाली कहा जाता है।
यह मुख्यतः नदियों और घाटियों के रूप में सतही जल के प्रवाह की प्रणाली को दर्शाता है।
नदी प्रणाली भूमि की ढलान, भूवैज्ञानिक संरचना, जल की मात्रा तथा जल के वेग जैसे कारकों पर निर्भर करती है।
ड्रेनेज पैटर्न के प्रकार:
1. वृक्ष के समान नदी प्रणाली (Dendritic Drainage Pattern):
यह सबसे सामान्य प्रकार की नदी प्रणाली है, जिसका पैटर्न पेड़ की जड़ों की शाखाओं जैसा दिखाई देता है।
यह पैटर्न वहाँ विकसित होता है जहाँ नदी क्षेत्र की ढलान का अनुसरण करती है।
यह उन क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ चट्टानों की कोई विशेष संरचना नहीं होती तथा धाराएँ सभी दिशाओं में समान रूप से फैल सकती हैं।
इसमें सहायक नदियाँ न्यून कोणों (90° से कम) पर मुख्य नदी से मिलती हैं।
उदाहरण: उत्तरी मैदानों की नदियाँ – सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र।

2. समानांतर नदी प्रणाली (Parallel Drainage Pattern):
यह प्रणाली उन क्षेत्रों में विकसित होती है जहाँ लंबी भू-आकृतियाँ और स्पष्ट ढलान मौजूद होता है।
उपनदी धाराएँ सतह के ढलान के अनुसार समानांतर रूप से बहती हैं।
उदाहरण: पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियाँ – गोदावरी, कावेरी, कृष्णा और तुंगभद्रा।

3. ट्रेल्स / ज़ालीदार नदी प्रणाली (Trellis Drainage Pattern):
यह नदी प्रणाली मुड़ी हुई स्थलाकृति में विकसित होती है जहाँ कठोर और नरम चट्टानें एक-दूसरे के समानांतर पाई जाती हैं।
डाउन-टर्न फोल्ड, जिन्हें सिंकलाइन कहा जाता है, घाटियों का निर्माण करते हैं जिनमें मुख्य धारा बहती है।
इस पैटर्न में मुख्य नदी की प्राथमिक सहायक नदियाँ एक-दूसरे के समानांतर बहती हैं, जबकि द्वितीयक सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हैं।
उदाहरण: हिमालय क्षेत्र के ऊपरी भाग की नदियाँ – सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र।

4. आयताकार नदी प्रणाली (Rectangular Drainage Pattern):
यह उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ भ्रंश युक्त भू-आकृतियाँ मौजूद होती हैं।
यह दृढ़ता से जुड़े हुए चट्टानी क्षेत्रों पर विकसित होती है।
धाराएँ न्यूनतम प्रतिरोध वाले मार्ग का अनुसरण करती हैं और उन स्थानों पर केंद्रित होती हैं जहाँ चट्टानें कमजोर होती हैं।
सहायक धाराएँ तीखे मोड़ बनाती हैं तथा उच्च कोणों पर मुख्य धारा से मिलती हैं।
उदाहरण: विंध्य पर्वत श्रेणी की नदियाँ – चंबल, बेतवा और केन।

वलय एवं भ्रंश (Folding and Faulting):
जब भू-पर्पटी पर संपीड़न बल लगता है, तो भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के कारण इसके आकार में परिवर्तन होता है, जिसे वलय एवं भ्रंश कहा जाता है।
वलय तब बनता है जब भू-पर्पटी समतल सतह से ऊपर या नीचे की ओर झुकती है।
ऊपर की ओर झुकने से एंटीकलाइन तथा नीचे की ओर झुकने से सिंकलाइन बनता है।
फॉल्टिंग तब होती है जब भू-पर्पटी पूरी तरह टूट जाती है और उसके भाग एक-दूसरे के सापेक्ष खिसक जाते हैं।
वलय या भ्रंश का निर्माण उस क्षेत्र की भू-सामग्री पर निर्भर करता है।
लचीली सामग्री में वलय बनने की संभावना अधिक होती है, जिससे पर्वतों का निर्माण होता है, जबकि भंगुर सामग्री में भ्रंश अधिक होता है, जिसके कारण भूकंप आते हैं।

5. अपकेंद्रीय नदी प्रणाली (Radial Drainage Pattern):
यह प्रणाली किसी ऊँचे केंद्रीय बिंदु के चारों ओर विकसित होती है और ज्वालामुखियों जैसे शंक्वाकार आकार बनाती है।
जब नदियाँ किसी पहाड़ी से निकलकर सभी दिशाओं में बहती हैं, तो इस पैटर्न को रेडियल कहा जाता है।
उदाहरण: अमरकंटक श्रेणी से निकलने वाली नदियाँ – नर्मदा और सोन (गंगा की सहायक नदी)।

6. अभिकेंद्री जल निकासी पैटर्न (Centripetal Drainage Pattern):
यह अपकेंद्रीय पैटर्न के ठीक विपरीत होता है, जिसमें धाराएँ एक केंद्रीय बिंदु की ओर बहती हैं।
मानसून के दौरान ये धाराएँ अल्पकालिक झीलों का निर्माण करती हैं, जो शुष्क मौसम में सूख जाती हैं।
कभी-कभी इन सूखी झीलों में नमक का निर्माण भी होता है, क्योंकि पानी के वाष्पीकरण के बाद घुला हुआ नमक बच जाता है।
उदाहरण: मणिपुर की लोकटक झील।
भारत की नदी प्रणाली
1. हिमालय नदी प्रणाली:
इस प्रणाली की नदियाँ हिम के पिघलने तथा वर्षा दोनों से पोषित होती हैं, इसलिए ये बारहमासी होती हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में ये नदियाँ V-आकार की घाटियाँ, रैपिड्स और झरने बनाती हैं।
मैदानों में प्रवेश करने पर ये समतल घाटियाँ, गोखुर झीलें, बाढ़ के मैदान तथा नदी के मुहाने के पास डेल्टा बनाती हैं।
(क) सिंधु नदी प्रणाली:
यह विश्व की सबसे बड़ी नदी घाटियों में से एक है।
सिंधु नदी हिमालयी नदियों में सबसे पश्चिमी नदी है।
इसका उद्गम तिब्बत के कैलाश पर्वत श्रेणी में बोखर चू के पास स्थित एक ग्लेशियर से होता है।
तिब्बत में इसे सिंगी खंबन या शेर का मुँह कहा जाता है।
भारत में यह केवल केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के लेह जिले से होकर बहती है।
इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ सतलुज, रावी, झेलम, चिनाब (सबसे बड़ी सहायक नदी) और व्यास हैं।
(ख) गंगा नदी प्रणाली:
गंगा नदी का उद्गम उत्तराखंड में गौमुख (3,900 मीटर) के पास स्थित गंगोत्री ग्लेशियर से होता है, जहाँ इसे भागीरथी कहा जाता है।
देवप्रयाग में भागीरथी, अलकनंदा से मिलती है और इसके बाद इसे गंगा कहा जाता है।
गंगा हरिद्वार में उत्तरी मैदानों में प्रवेश करती है।
यह उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है।
दाहिने किनारे की प्रमुख सहायक नदियाँ यमुना और सोन हैं, जबकि बाएँ किनारे की सहायक नदियाँ रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी और महानंदा हैं।
यमुना गंगा की सबसे पश्चिमी और सबसे लंबी सहायक नदी है, जिसका उद्गम यमुनोत्री ग्लेशियर से होता है।
गंगा गंगासागर द्वीप के पास बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
(ग) ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली:
यह विश्व की सबसे बड़ी नदियों में से एक है।
इसका उद्गम मानसरोवर झील के पास स्थित चेमायुंगडुंग ग्लेशियर (कैलाश श्रेणी) से होता है।
दक्षिणी तिब्बत में इसे त्संगपो कहा जाता है, जिसका अर्थ ‘शोधक’ होता है।
हिमालय की तलहटी से निकलते समय इसे सियांग या दिहांग कहा जाता है।
यह अरुणाचल प्रदेश के सादिया शहर के पश्चिम में भारत में प्रवेश करती है।
बाएँ किनारे की प्रमुख सहायक नदियाँ दिबांग (सिकांग), लोहित, बूढ़ी दिहिंग और धनसारी हैं।
दाहिने किनारे की प्रमुख सहायक नदियाँ सुबनसिरी, कामेंग, मानस और संकोश हैं।
बांग्लादेश में यह पद्मा नदी में मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
2. प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली:
निश्चित जलधारा, मेन्डर्स की अनुपस्थिति तथा गैर-बारहमासी प्रवाह इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
यह प्रणाली हिमालयी नदी प्रणाली की तुलना में अधिक प्राचीन है।
पश्चिमी घाट, पश्चिमी तट के समानांतर बहने वाली नदियों के बीच जल विभाजक का कार्य करता है।
नर्मदा और तापी को छोड़कर अधिकांश नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं।
महत्त्वपूर्ण नदियाँ – महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी।
नर्मदा:
यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी पश्चिम की ओर बहने वाली नदी है।
यह विंध्य (उत्तर) और सतपुड़ा (दक्षिण) श्रेणियों के बीच भ्रंश घाटी से होकर बहती है।
इसका उद्गम मध्य प्रदेश में अमरकंटक के पास मैकाल श्रेणी से होता है।
प्रमुख सहायक नदियाँ – हिरन, ओरसंग, बरना और कोलार।
इसका बेसिन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ भागों में फैला है।
इसी नदी पर सरदार सरोवर परियोजना का निर्माण किया गया है।
तापी:
यह पश्चिम की ओर बहने वाली एक अन्य महत्त्वपूर्ण नदी है।
इसका उद्गम मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले में सतपुड़ा पर्वतमाला से होता है।
यह नर्मदा के समानांतर भ्रंश घाटी में बहती है, परंतु इसकी लंबाई कम है।
इसका बेसिन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ हिस्सों में फैला है।
महानदी:
इसका उद्गम छत्तीसगढ़ के रायपुर ज़िले से होता है।
यह ओडिशा से होकर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
इसका 53% अपवाह बेसिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तथा 47% ओडिशा में स्थित है।
प्रमुख सहायक नदियाँ – सिवनाथ, हसदेव, मांड, इब, जोंकिंग और तेल।
इसका बेसिन उत्तर में मध्य भारत की पहाड़ियों, दक्षिण-पूर्व में पूर्वी घाट और पश्चिम में मैकाल श्रेणी से घिरा है।
गोदावरी:
यह सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली है और इसे “दक्षिण गंगा” कहा जाता है।
इसका उद्गम महाराष्ट्र के नासिक ज़िले से होता है।
यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
इसकी सहायक नदियाँ महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश से होकर बहती हैं।
पेनगंगा, इंद्रावती, प्राणहिता और मांजरा इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
कृष्णा:
यह दूसरी सबसे बड़ी पूर्व की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदी है।
इसका उद्गम सह्याद्री पर्वतमाला में महाबलेश्वर के पास होता है।
प्रमुख सहायक नदियाँ – कोयना, तुंगभद्रा और भीमा।
यह महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से होकर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
कावेरी:
कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के कोडागु ज़िले की ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से होता है।
यह दक्षिण भारत की पवित्र नदी मानी जाती है।
प्रमुख सहायक नदियाँ – अर्कावती, हेमावती, भवानी, काबिनी और अमरावती।
यह कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से होकर दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती हुई पांडिचेरी के पास बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र दो भागों में विभक्त होती हैं :
1. अरब सागर में गिरने वाली नदियां :
अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ मुख्य रूप से भारत के पश्चिम की ओर बहती हैं। इनमें से अधिकांश नदियाँ डेल्टा (Delta) नहीं बनातीं, बल्कि एस्तुआरी (Estuary) या ‘ज्वारनदमुख’ बनाती हैं क्योंकि वे ढाल वाली कठोर चट्टानों से होकर तेज़ी से गिरती हैं।
यहाँ उन नदियों की सूची है जो अपना जल अरब सागर में विसर्जित करती हैं:
- नर्मदा (Narmada): यह मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलती है और विंध्य एवं सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के बीच ‘भ्रंश घाटी’ (Rift Valley) में बहती है।
- ताप्ती (Tapti/Tapi): यह भी मध्य प्रदेश (बैतुल) से निकलती है और नर्मदा के समानांतर बहती है।
- साबरमती (Sabarmati): राजस्थान की अरावली पहाड़ियों से निकलकर गुजरात से होते हुए खंभात की खाड़ी में गिरती है।
- माही (Mahi): यह भारत की एकमात्र नदी है जो कर्क रेखा (Tropic of Cancer) को दो बार काटती है।
- लूनी (Luni): यह कच्छ के रण में विलीन हो जाती है, लेकिन इसका प्रवाह अरब सागर की ओर ही होता है (इसे अंतःस्थलीय नदी भी कहते हैं)।
- घग्घर (Ghaggar): एक मौसमी नदी।
- पेरियार (Periyar): केरल की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण नदी।
- मांडवी और जुआरी: गोवा की प्रमुख नदियाँ।
याद रखने की जबरदस्त Short Trick:
अरब सागर की नदियों को याद रखने के लिए यह ट्रिक सबसे प्रसिद्ध है:
“समानता का जोश” (या सिर्फ ‘समानता’)
- स (Sa): साबरमती (Sabarmati)
- मा (Ma): माही (Mahi)
- न (Na): नर्मदा (Narmada)
- ता (Ta): ताप्ती (Tapti)

महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts)
| विशेषता | विवरण |
| प्रवाह की दिशा | पूर्व से पश्चिम (East to West) |
| मुहाना (Mouth) | ये डेल्टा के बजाय Estuary (एस्तुआरी) बनाती हैं। |
| भ्रंश घाटी | नर्मदा और ताप्ती ‘Rift Valley’ में बहने वाली प्रमुख नदियाँ हैं। |
| सबसे लंबी | अरब सागर में गिरने वाली प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी नर्मदा है। |
भादर नदी
भादर नदी गुजरात के राजकोट से निकलती है तथा अरब सागर में गिरती है।
शतरंजी नदी
शतरंजी नदी गुजरात के अमरेली जिले से निकलती है और खंभात की खाड़ी में गिरती है।
साबरमती नदी
साबरमती नदी उदयपुर (राजस्थान) के निकट अरावली पर्वतमाला से निकलती है तथा गुजरात से होकर बहते हुए खंभात की खाड़ी में अपना जल गिराती है।
माही नदी
माही नदी मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित विन्ध्याचल पर्वत से निकलती है। इसका प्रवाह मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं गुजरात राज्यों में है। इसकी सहायक नदियाँ सोम एवं जाखम हैं। यह खंभात की खाड़ी में अपना जल गिराती है।
नर्मदा नदी
नर्मदा नदी का उद्गम मैकाल पर्वत की अमरकंटक चोटी से होता है। नर्मदा का प्रवाह क्षेत्र मध्य प्रदेश (87 प्रतिशत), गुजरात (11.5 प्रतिशत) एवं महाराष्ट्र (1.5 प्रतिशत) में फैला हुआ है।
नर्मदा नदी विन्ध्याचल पर्वतमाला एवं सतपुड़ा पर्वतमाला के बीच भ्रंश घाटी में बहती है। यह अरब सागर में गिरने वाली प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी है। खंभात की खाड़ी में गिरने पर यह ज्वारनदमुख (एश्चुअरी) का निर्माण करती है।
इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ तवा, बरनेर, दूधी, शक्कर, हिरन, बरना, कोनार एवं माचक हैं।
मध्य प्रदेश में नर्मदा जयंती के अवसर पर अमरकंटक में तीन दिनों का नर्मदा महोत्सव आयोजित किया जाता है।
एश्चुअरी या ज्वारनदमुख
नदी का वह जलमग्न मुहाना जहाँ स्थल से आने वाले मीठे जल और सागरीय खारे जल का मिलन होता है, ज्वारनदमुख कहलाता है। नदी के जल में तीव्र प्रवाह के कारण जब मुहाने पर मलवों का निक्षेप नहीं होता तथा मलबा नदी के साथ समुद्र में चला जाता है, तब नदी का मुहाना गहरा हो जाता है। ऐसे गहरे मुहाने को ज्वारनदमुख कहा जाता है।
तापी नदी
तापी नदी मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुल्लाई नामक स्थान से निकलती है। यह सतपुड़ा एवं अजंता पहाड़ियों के बीच भ्रंश घाटी में बहती है। तापी नदी का बेसिन महाराष्ट्र (79 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (15 प्रतिशत) एवं गुजरात (6 प्रतिशत) में विस्तृत है।
तापी की मुख्य सहायक नदी पूरणा है। तापी नदी खंभात की खाड़ी में अपना जल गिराती है तथा एश्चुअरी का निर्माण करती है।
माण्डवी नदी
माण्डवी नदी कर्नाटक राज्य में पश्चिमी घाट पर्वत के भीमगाड झरने से निकलती है। यह पश्चिम दिशा में प्रवाहित होती हुई गोवा राज्य से होकर बहती है और अंततः अरब सागर में गिरती है।
जुआरी नदी
जुआरी नदी गोवा राज्य में पश्चिमी घाट से निकलती है। यह पश्चिम दिशा में बहते हुए अरब सागर में गिरती है तथा गोवा की सबसे लंबी नदी है।
शरावती नदी
शरावती नदी कर्नाटक राज्य में पश्चिमी घाट पर्वत की अम्बुतीर्थ नामक पहाड़ी से निकलती है। यह कर्नाटक राज्य में बहते हुए अरब सागर में गिरती है। जोग जलप्रपात इसी नदी पर स्थित है।
गंगावेली नदी
गंगावेली नदी कर्नाटक राज्य में पश्चिमी घाट पर्वत से निकलती है और कर्नाटक राज्य में बहते हुए अरब सागर में गिरती है।
पेरियार नदी
पेरियार नदी अन्नामलाई पहाड़ी से निकलती है तथा केरल राज्य में बहते हुए अरब सागर में गिरती है। यह केरल की दूसरी सबसे लंबी नदी है। इसे केरल की जीवन रेखा भी कहा जाता है। इसका प्रवाह क्षेत्र केरल एवं तमिलनाडु राज्यों में फैला हुआ है।
भरतपूजा नदी
भरतपूजा नदी अन्नामलाई पहाड़ी से निकलती है। इसका अन्य नाम पोन्नानी है। यह केरल की सबसे लंबी नदी है तथा इसका प्रवाह क्षेत्र केरल एवं तमिलनाडु राज्यों में विस्तृत है।
पंबा नदी
पंबा नदी केरल राज्य की नदी है तथा यह वेम्बनाद झील में गिरती है।
2. बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियां :
ये नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में डेल्टा बनाती हैं:
- गंगा (Ganga): भारत की सबसे लंबी नदी, जो अंत में ब्रह्मपुत्र के साथ मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा (सुंदरवन) बनाती है।
- ब्रह्मपुत्र (Brahmaputra): तिब्बत और असम से होते हुए बांग्लादेश में गंगा से मिलती है।
- महानदी (Mahanadi): छत्तीसगढ़ और ओडिशा से बहती हुई डेल्टा बनाती है।
- गोदावरी (Godavari): इसे ‘दक्षिण गंगा’ भी कहते हैं। यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है।
- कृष्णा (Krishna): महाबलेश्वर से निकलकर आंध्र प्रदेश के पास समुद्र में मिलती है।
- कावेरी (Kaveri): कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बहती है।
- स्वर्णरेखा (Subarnarekha): झारखंड और ओडिशा के क्षेत्र से।
याद रखने की Short Trick:
“MP की गोद में रेखा का कब विलय हुआ”
- M – महानदी
- P – पेन्नार
- गोद – गोदावरी
- रेखा – स्वर्णरेखा
- का – कावेरी
- क – कृष्णा
- ब – ब्रह्मपुत्र
- विलय – (वैगई)
- हुआ – हुगली/गंगा

(1) हुगली नदी
यह नदी प. बंगाल में गंगा नदी की वितरिका के रूप में उद्गमित होती है एवं बंगाल की खाड़ी में जल गिराती है।
(2) दामोदर नदी
यह छोटा नागपुर पठार, पलामू जिला, झारखण्ड से निकलती है। पूर्व दिशा में बहते हुए प. बंगाल में हुगली नदी में मिल जाती है। यह अतिप्रदूषित नदी है। यह बंगाल का शोक कहलाती है। इसका प्रवाह क्षेत्र झारखण्ड एवं प. बंगाल राज्य है।
(3) स्वर्ण रेखा नदी
यह नदी रांची के पठार से निकलती है। यह पश्चिम बंगाल–उड़ीसा के बीच सीमा रेखा बनाती है। यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
(4) वैतरणी नदी
यह ओडीसा के क्योंझर जिले से निकलती है। इसका प्रवाह क्षेत्र ओडीसा एवं झारखण्ड राज्य है। यह बंगाल की खाड़ी में जल गिराती है।
(5) ब्राह्मणी नदी
इसकी उत्पत्ति ओडीसा राज्य की कोयेल एवं शंख नदियों की धाराओं के मिलने से हुई है। यह बंगाल की खाड़ी में अपना जल गिराती है।
(6) महानदी
महानदी का उद्गम मैकाल पर्वत की सिंहाना पहाड़ी (धमतरी जिला, छत्तीसगढ़) से होता है। इसका प्रवाह क्षेत्र छत्तीसगढ़ एवं ओडीसा राज्य में है। यह बंगाल की खाड़ी में अपना जल गिराती है।
(7) गोदावरी नदी
यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है। गोदावरी नदी का उद्गम नासिक जिले की त्र्यम्बक पहाड़ी से होता है। गोदावरी को ‘दक्षिण गंगा’ व ‘वृद्ध गंगा’ भी कहा जाता है।
गोदावरी महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, ओडीसा, कर्नाटक एवं यनम (पुदुचेरी) राज्यों से होकर बहती है।
सहायक नदियां – दुधना, पूर्ण, पेनगंगा, वेनगंगा, इन्द्रावती, सेलूरी, प्राणहिता एवं मंजरा/मंजीरा (दक्षिण से मिलने वाली प्रमुख नदी)।
(8) कृष्णा नदी
कृष्णा नदी का उद्गम महाबलेश्वर से होता है। यह प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे लंबी नदी है।
यह बंगाल की खाड़ी में डेल्टा बनाती है।
यह महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना एवं आंध्रप्रदेश से होकर बहती है।
सहायक नदियां – भीमा, तुंगाभद्रा, कोयना, वर्णा, पंचगंगा, घाटप्रभा, दूधगंगा, मालप्रभा एवं मूसी।
(9) पेन्नार नदी
यह कर्नाटक के कोलार जिले की नंदीदुर्ग पहाड़ी से निकलती है।
(10) कावेरी नदी
कावेरी कर्नाटक राज्य के कुर्ग जिले की ब्रह्मगिरी की पहाड़ियों से निकलती है।
दक्षिण भारत की यह एकमात्र नदी है जिसमें वर्ष भर सतत रूप से जल प्रवाह बना रहता है। इसका कारण है—कावेरी का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र (कर्नाटक) दक्षिण-पश्चिम मानसून से वर्षा जल प्राप्त करता है, जबकि निचला जलग्रहण क्षेत्र (तमिलनाडु) उत्तर-पूर्वी मानसून से जल प्राप्त करता है।
इसके अपवाह का 56 प्रतिशत तमिलनाडु, 41 प्रतिशत कर्नाटक व 3 प्रतिशत केरल में पड़ता है।
सहायक नदियां – लक्ष्मण तीर्थ, कंबिनी, सुवर्णावती, भवानी, अमरावती, हेरंगी, हेमावती, शिमसा, अर्कवती।
(11) वैगाई नदी
यह तमिलनाडु के वरशनाद पहाड़ी से निकलती है एवं पाक की खाड़ी में अपना जल गिराती है।
(12) ताम्रपर्णी नदी
यह तमिलनाडु राज्य में बहती है एवं मन्नार की खाड़ी में अपना जल गिराती है।
3.अंतःस्थलीय नदियाँ
कुछ नदियाँ ऐसी होती हैं जो सागर तक नहीं पहुंच पातीं और रास्ते में ही लुप्त हो जाती हैं। ये अंतःस्थलीय नदियाँ कहलाती हैं। घग्घर, लूनी नदी इसके मुख्य उदाहरण हैं।
(1) घग्घर नदी
घग्घर एक मौसमी नदी है जो हिमालय की निचली ढालों से (कालका के समीप) निकलती है और अनुपगढ़ (राजस्थान) में लुप्त हो जाती है। घग्घर को ही वैदिक काल की सरस्वती माना जाता है।
(2) लूनी नदी
लूनी का उद्गम स्थल राजस्थान में अजमेर जिले के दक्षिण-पश्चिम में अरावली पर्वत का अन्नासागर है। अरावली के समानांतर पश्चिम दिशा में बहती है। यह नदी कच्छ के रन के उत्तर में साहनी कच्छ में समाप्त हो जाती है।

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